

आसनसोल। संताल समाज की सांस्कृतिक विरासत दासाय को केवल नाच-गाने और धन संग्रह तक सीमित करने की प्रवृत्ति पर समाज के मांझी-मोड़लों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि दासाय पूर्वजों की स्मृतियों, लोकविश्वासों, सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी परंपरा है, जिसे सही संदर्भ में समझना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। इसी उद्देश्य से शनिवार को पश्चिम बर्दवान जिले के आसनसोल दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के पल्टन धौड़ा आदिवासी इलाके में एक विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें संताल समाज के पारंपरिक नेतृत्वकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और गणमान्य लोगों ने दासाय के ऐतिहासिक संदर्भ, लोककथाओं और सामाजिक महत्व पर विचार रखे। पश्चिम बर्दवान मांझी मापाजी मांड़वा, डामरा 16 पाड़ा की पहल तथा जातियारी मांझी मापाजी गड़ोसपोहत बायसी (आसनसोल दक्षिण) के सहयोग से पल्टन धौड़ा के सामुदायिक भवन में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को दासाय की वास्तविक परंपरा और सांस्कृतिक महत्ता से परिचित कराना था। संताल समाज में दासाय का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। शरद ऋतु में दुर्गापूजा के आसपास इसके नृत्य और गीत की परंपरा देखने को मिलती है। परंपरागत रूप से संताल युवक समूह बनाकर विभिन्न गांवों में जाते हैं और दासाय प्रस्तुत करते हैं। उनकी वेशभूषा, नृत्य शैली, वाद्ययंत्र और गीत समाज की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करते हैं। दासाय की उत्पत्ति और उसके महत्व को लेकर संताल समाज में अलग-अलग लोककथाएं प्रचलित हैं। कुछ मौखिक परंपराओं में पूर्वजों के संघर्ष और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा की स्मृतियां मिलती हैं, जबकि कुछ कथाओं में बिछड़े हुए लोगों या समाज के मार्गदर्शकों की तलाश का उल्लेख है। कुछ लोककथाओं में हुदुड़ दुर्गा से संबंधित आख्यानों का भी दासाय के साथ संबंध बताया जाता है। हालांकि, इन कथाओं का स्वरूप क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग है। इसलिए इन्हें एक ही सर्वमान्य ऐतिहासिक विवरण मानने के बजाय संताल समाज की बहुआयामी मौखिक विरासत के रूप में समझने की जरूरत है। संगोष्ठी में बाजारों, सड़क चौराहों और रेलवे स्टेशनों पर दासाय के नाम पर लोगों से धन मांगने की प्रवृत्ति प्रमुख चर्चा का विषय रही। संगठन के मांझी-मोड़लों ने आरोप लगाया कि कुछ लोग दासाय की सांस्कृतिक पहचान और परंपरागत स्वरूप को उचित ढंग से प्रस्तुत किए बिना धन संग्रह कर रहे हैं। इससे समाज की परंपरा के बारे में गलत धारणा बनने की आशंका है। वक्ताओं ने कहा कि दासाय को केवल धन जुटाने या सार्वजनिक प्रदर्शन का माध्यम मानना उसके व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को सीमित करना है। इसके मूल स्वरूप, अनुशासन और परंपरागत मान्यताओं को समझना जरूरी है। उन्होंने युवा पीढ़ी को दासाय के इतिहास और उद्देश्य से परिचित कराने तथा लोकपरंपराओं के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास करने पर जोर दिया। वही पश्चिम बर्दवान मांझी मापाजी मांड़वा के जिला जकपरानिक रामलाल टुडू ने कहा कि संताल समाज में पूर्वज लोककथाओं, गीतों और परंपराओं के माध्यम से अगली पीढ़ी को दासाय का महत्व समझाते रहे हैं। उन्होंने बताया कि इसका संबंध केवल नृत्य और गीत से नहीं, बल्कि युवाओं की एकजुटता, आपसी संपर्क और सामाजिक संबंधों से भी है। उन्होंने कहा कि दासाय के दौरान विभिन्न गांवों में जाकर लोगों से मिलना, उनके हालचाल जानना तथा उनकी सुविधाओं और परेशानियों के बारे में जानकारी हासिल करना भी इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष रहा है। लेकिन वर्तमान पीढ़ी के कई युवा इसकी गहराई और ऐतिहासिक-सामाजिक महत्व से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। इसी कमी को दूर करने और परंपरा के वास्तविक स्वरूप पर चर्चा करने के उद्देश्य से संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में उपस्थित कालीपद मुर्मू ने कहा कि आसनसोल के संताल युवाओं में दासाय के बारे में जानने की रुचि बढ़ रही है, जो सकारात्मक संकेत है। हालांकि, जिले के विभिन्न क्षेत्रों में दासाय के नाम पर जगह-जगह धन मांगने की प्रवृत्ति को लेकर उन्होंने चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को सही रूप में समझना और उसकी महत्ता अगली पीढ़ी तक पहुंचाना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने इस संगोष्ठी के आयोजन के लिए पश्चिम बर्दवान मांझी मापाजी मांड़वा की पहल की सराहना भी की। संगोष्ठी में इस बात पर जोर दिया गया कि किसी समाज की संस्कृति केवल त्योहारों और आयोजनों तक सीमित नहीं होती। उसमें इतिहास, जीवन-दृष्टि, सामाजिक संबंध और पूर्वजों के अनुभव समाहित रहते हैं। दासाय जैसी परंपरा को जीवित रखने के लिए युवाओं को अपनी भाषा, लोकगीत, लोककथाओं, पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य शैली के बारे में जानकारी हासिल करनी होगी। पल्टन धौड़ा में आयोजित इस संगोष्ठी के माध्यम से संताल समाज की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का संदेश दिया गया। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि दासाय के वास्तविक स्वरूप और परंपरागत महत्व को लेकर जितनी जागरूकता बढ़ेगी, उतनी ही गलत व्याख्याओं की आशंका कम होगी। इसके लिए समाज के पारंपरिक नेतृत्वकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और युवा पीढ़ी को मिलकर प्रयास करना होगा।
