
जामुड़िया। केंदा क्षेत्र में ईसीएल की केंदा ओपनकास्ट परियोजना के विस्तार के बीच विस्थापन और पुनर्वास का मुद्दा एक बार फिर सामने आया है। दिशोम आदिवासी गांवता के नेतृत्व में विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने शनिवार को केंदा ओसीपी से सटे खेपडांगा और शालडांगा क्षेत्रों का दौरा कर स्थानीय लोगों से बातचीत की। संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रभावित परिवारों की समस्याओं का जायजा लिया और उनकी मांगों को लेकर आगे आंदोलन की चेतावनी दी। दौरे के दौरान आदिवासी संगठनों के नेताओं दिलीप सोरेन, संजय हेमराम और राजेन टुडू ने बताया कि शालडांगा बस्ती से केंदा ओसीपी की दूरी महज करीब 20 मीटर है, जबकि खेपडांगा क्षेत्र खदान से लगभग 50 मीटर की दूरी पर स्थित है। उनके अनुसार, शालडांगा में करीब 350 परिवार और खेपडांगा में लगभग 45 परिवार निवास करते हैं। खदान का विस्तार आबादी वाले क्षेत्रों के करीब पहुंचने के कारण स्थानीय लोगों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ रही है। संगठनों के नेताओं का आरोप है कि खदान में होने वाले विस्फोटों के कारण आसपास के कई मकानों में दरारें आ गई हैं। खदान के लगातार विस्तार और बस्तियों के नजदीक आने से लोगों को अपने घरों तथा भविष्य की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। उनका कहना है कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था को लेकर अब तक पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं। आदिवासी संगठनों के अनुसार, खेपडांगा के करीब 10 परिवारों को ईसीएल के खदान मजदूर आवास में अस्थायी रूप से स्थानांतरित किया गया है, लेकिन शेष परिवारों के लिए स्थायी पुनर्वास की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई है। संगठनों ने मांग की कि खदान विस्तार से प्रभावित सभी परिवारों के लिए सम्मानजनक और स्थायी पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए।स्थानीय लोगों ने क्षेत्र में बढ़ते जल संकट की समस्या भी प्रतिनिधियों के सामने रखी। उनका कहना है कि खनन गतिविधियों के कारण भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है, जिसके चलते स्थानीय जलस्रोतों और जलाशयों में पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं रहता। इसके अलावा लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की ओर से उपलब्ध कराया जाने वाला पेयजल भी नियमित और पर्याप्त नहीं होने का आरोप लगाया गया। आदिवासी संगठनों ने कहा कि पुनर्वास केवल मकान उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रभावित परिवारों के जीवन-यापन, जमीन, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। स्थानीय लोगों के अनुसार, ईसीएल की ओर से प्रभावित परिवारों को दूसरी जगह बसाने के लिए प्रत्येक परिवार को करीब 5 लाख 30 हजार रुपये देने का प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि, आदिवासी संगठनों और स्थानीय निवासियों ने इस प्रस्ताव पर असहमति जताई है। उनकी मांग है कि मुआवजे की गणना केवल एक परिवार के आधार पर नहीं, बल्कि परिवार के सभी वयस्क सदस्यों के हितों को ध्यान में रखकर की जाए। संगठनों की मांग है कि प्रभावित परिवारों के प्रत्येक वयस्क सदस्य के लिए अलग आवास की व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही प्रत्येक परिवार को तीन कट्ठा जमीन और घर निर्माण के लिए 10 लाख रुपये देने की मांग भी रखी गई है।
इसके अतिरिक्त, दोनों इलाकों में करीब 50 लोगों के पास पट्टे की जमीन होने का दावा करते हुए संगठनों ने कहा कि ऐसी जमीन के लिए अलग से उचित मूल्य अथवा मुआवजा दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि पट्टे की जमीन को सामान्य मुआवजे में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने बताया कि इन सभी मांगों को लेकर ईसीएल प्रबंधन के समक्ष एक संगठित प्रस्ताव रखा जाएगा। उनका कहना है कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, जमीन, मकान, मुआवजा, पेयजल और सुरक्षा से जुड़े सभी मुद्दों को प्रस्ताव में शामिल किया जाएगा। संगठनों ने स्पष्ट किया कि यदि ईसीएल प्रबंधन उनकी मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं करता है तो आने वाले दिनों में व्यापक आंदोलन किया जाएगा। इसी आंदोलन की रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से विभिन्न आदिवासी संगठनों के नेताओं ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया और स्थानीय लोगों से बातचीत की। दिशोम आदिवासी गांवता सहित अन्य संगठनों के नेताओं ने कहा कि खदान के विस्तार से यदि आबादी प्रभावित होती है तो विकास के साथ-साथ प्रभावित परिवारों के अधिकारों और सुरक्षित पुनर्वास को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों को उचित मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास दिए बिना खदान विस्तार को लेकर आगे बढ़ना उचित नहीं होगा। फिलहाल आदिवासी संगठनों की ओर से ईसीएल प्रबंधन को प्रस्ताव सौंपने की तैयारी की जा रही है। प्रस्ताव पर प्रबंधन की प्रतिक्रिया के बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी। वहीं, स्थानीय लोगों की नजर अब इस बात पर है कि ईसीएल की ओर से पुनर्वास और मुआवजे को लेकर क्या कदम उठाया जाता है।
