
कोलकाता : लोक भवन, कोलकाता तथा राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 23 सितंबर 2026 भारतीय साहित्य गगन के सूर्य, ओज और जनमानस के अमर रचनाकार राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पावन जयंती तथा उनकी कालजयी काव्यकृति ‘रश्मिरथी’ के हीरक जयंती वर्ष (75वें वर्ष) के ऐतिहासिक एवं गौरवशाली अवसर पर कोलकाता स्थित लोकभवन के प्रतिष्ठित ‘वंदे मातरम सभागार’ में एक अत्यंत भव्य, गरिमामयी और ऐतिहासिक समारोह ‘रश्मिरथी पर्व’ का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम समता मूलक, समरस, समावेशी एवं सांस्कृतिक समाज के निर्माण के महान संकल्प को समर्पित रहा, जिसमें देश के कोने-कोने से पधारे प्रबुद्ध साहित्यप्रेमियों, कलाकारों, विचारकों, शिक्षाविदों और गणमान्य नागरिकों ने भारी संख्या में भाग लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक और सांस्कृतिक गरिमा के साथ राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान के गान से हुआ। इसके पश्चात, समारोह के माननीय मुख्य अतिथि तथा अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप-प्रज्वलित कर तथा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी के तैल-चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यक्रम का औपचारिक एवं मंगलमय उद्घाटन किया।

इस ऐतिहासिक अवसर पर पश्चिम बंगाल के माननीय राज्यपाल श्री आर.एन. रवि जी ने मुख्य अतिथि के रूप में अपनी गरिमामयी उपस्थिति के साथ कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों की कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने विशिष्ट अतिथि के रूप में अपनी सहभागिता दर्ज कराई, जिनमें प्रमुख हैं: माननीय श्री उमेश राय जी संसदीय कार्य, नगर विकास एवं नगर पालिका मामले राज्यमंत्री, पश्चिम बंगाल सरकार श्री जय गोपाल गुप्ता अध्यक्ष, श्री बड़ा बाजार लाइब्रेरी, कोलकाता, पश्चिम बंगाल, डॉ. सुभाष चंद्र राय प्राध्यापक, हिन्दी भवन, विश्वभारती विश्वविद्यालय, शान्तिनिकेतन, पश्चिम बंगाल।समारोह में माननीय राज्यपाल महोदय अपने ओजस्वी संबोधन में कहा कि “रामधारी सिंह ‘दिनकर’ केवल एक कवि या लेखक नहीं थे, वे इस राष्ट्र की अंतरात्मा की जीवंत आवाज थे। उनकी रचना ‘रश्मिरथी’ हमें यह सिखाती है कि मनुष्य की महानता उसके ऊंचे कुल या जन्म से नहीं, बल्कि उसके पुरुषार्थ, कर्म, चरित्र और उसके मानवीय मूल्यों से तय होती है। साथ हीं साथ उन्होंने अपने जीवन के अनुभव भी बताया।”

उन्होंने आगे कहा कि “आज के दौर में जब समाज में विभिन्न प्रकार की दूरियां, विसंगतियां और स्वार्थ की दीवारें खड़ी हो रही हैं, तब राष्ट्रकवि दिनकर जी का साहित्य हमें एक सूत्र में पिरोने और समाज को दिशा देने का सबसे बड़ा संबल प्रदान करता है।
‘रश्मिरथी पर्व’ के आयोजन का मूल उद्देश्य आज के इस आधुनिक दौर में सांस्कृतिक समरसता और सामाजिक न्याय के उन शाश्वत मूल्यों को पुनर्जीवित करना है, जिनकी मुखर वकालत ‘रश्मिरथी’ के प्रमुख पात्र कर्ण ने अपने पूरे जीवन में की थी। न्याय, समानता, मानवीय करुणा, मैत्री-धर्म और संघर्षशीलता का संदेश देने वाली यह महाकाव्य कृति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी कि 75 वर्ष पूर्व इसके प्रथम प्रकाशन के समय थी। श्री नीरज कुमार अध्यक्ष, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ स्मृति न्यास, दिल्ली जिन्होंने कार्यक्रम का स्वागत भाषण प्रस्तुत किया डॉ. संजय पंकज जी: सुप्रसिद्ध कवि, मुजफ्फरपुर, बिहार ने विषय-प्रवर्तन के साथ ही मंच का अत्यंत सफल, जीवंत एवं ओजस्वी संचालन किया। डॉ पंकज ने कहा कि राष्ट्रीय चेतना के बड़े कवि दिनकर सामाजिक न्याय, समरसता,सांस्कृतिक बोध और जीवन राग के चिंतक तथा मनस्वी थे। जीवन-संघर्ष और मानवीय मूल्य आधारित उनके सृजन हमें प्रेरित करते हुए आशावादी बनाते हैं। दिनकर विश्व बंधुत्व और मानवता कालजयी कवि-मनीषी हैं

न्यास के अध्यक्ष श्री नीरज कुमार ने अपने स्वागत भाषण में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “राष्ट्रकवि दिनकर जी ने समाज के शोषितों, वंचितों और अंतिम पायदान पर खड़े हर एक व्यक्ति की पीड़ा, अपमान और संघर्ष को अपनी कविताओं में अद्वितीय स्वर दिया। ‘रश्मिरथी पर्व’ उसी वैचारिक चेतना, क्रांति और समता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का हमारा एक विनम्र और निरंतर प्रयास है।”
इस अखिल भारतीय स्तर के आयोजन का सबसे मुख्य, रोमांचक और ऐतिहासिक आकर्षण राष्ट्रकवि दिनकर की कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ का भव्य नाटकीय मंचन रहा। इस अनूठे नाट्य मंचन के निर्देशन की कमान ‘लिम्का बुक ऑफ रिकाॅर्ड्स’ एवं ‘वर्ल्ड वाइड रिकाॅर्ड्स’ में अपनी कला का लोहा मनवाने वाले मुंबई के प्रख्यात एवं प्रतिष्ठित रंगकर्मी हैं। उनके कुशल और जादुई निर्देशन में मंच पर कलाकारों ने दानवीर कर्ण के चरित्र, उनके जीवन के संघर्ष, मैत्री-धर्म, त्याग, दानशीलता, पुरुषार्थ और सामाजिक न्याय के संदेश को इस प्रकार जीवंत किया कि पूरा सभागार मंत्रमुग्ध हो गया। सभागार में उपस्थित दर्शकों ने लगातार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय की सराहना की और इस प्रस्तुति को भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक मील का पत्थर बताया। कर्ण के जीवन के विभिन्न प्रसंगों ने दर्शकों की आँखों को नम करने के साथ-साथ उनके भीतर उच्च मानवीय मूल्यों की प्रेरणा भी जगाई।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में श्री नरेन्द्र कुमार शर्मा जी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने राजभवन, कोलकाता के प्रशासनिक सहयोग, सभी उपस्थित माननीय अतिथियों, मंच को सजाने वाले कलाकारों, मीडियाकर्मियों तथा देश के विभिन्न हिस्सों से पधारे सभी साहित्यप्रेमियों का हृदय से आभार व्यक्त किया। अंत में राष्ट्रगान के जन-गण-मन के सामूहिक गायन के साथ इस ऐतिहासिक, भव्य और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध समारोह का सफलतापूर्वक समापन हुआ।
समारोह के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में राष्ट्रकवि दिनकर के महान साहित्यिक अवदान और ‘रश्मिरथी’ के 75 वर्षों के गौरवशाली सफर को समर्पित एक विशेष एवं संग्रहणीय स्मारिका ‘मैं विभा-पुत्र, जागरण गान है मेरा’ का लोकार्पण अतिथियों के कर-कमलों से अत्यंत हर्षोल्लास के साथ किया गया।

यह स्मारिका दिनकर जी के क्रांतिकारी विचारों, उनके ओज, उनकी कविताओं की गहराई और सामाजिक समरसता के संदेश को आधुनिक पीढ़ी तक पहुंचाने का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। वक्ताओं ने अपने संबोधन में विशेष रूप से रेखांकित किया कि यह स्मारिका भविष्य के शोधार्थियों, विद्यार्थियों और साहित्यप्रेमियों के लिए अत्यंत उपयोगी और मार्गदर्शक सिद्ध होगी।
कार्यक्रम का एक अन्य अत्यंत भावनात्मक और गौरवान्वित करने वाला क्षण वह था, जब पश्चिम बंगाल के माननीय राज्यपाल श्री आर.एन. रवि जी के कर-कमलों से मुंबई के वरिष्ठ रंगकर्मी श्री मुजीब खान जी को भारतीय रंगमंच, नाट्य कला और संस्कृति को दी गई उनकी अतुलनीय एवं दीर्घकालिक सेवाओं के लिए प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रकवि दिनकर संस्कृति सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
