
कोलकाता । मुनि रविन्द्र विजय महाराज एवं मुनि महेन्द्र विजय महाराज के सानिध्य में महावीर भाई संघवी, तौशिक जैन (महावीर आराधना मंडल) द्वारा श्री वर्द्धमान जैन संघ में अष्टापद भाव यात्रा की प्रस्तुति से सभी श्रावक – श्राविका भाव विभोर हो गये ।

मुनि रविन्द्र विजय महाराज ने कहा अष्टापद भाव यात्रा जैन धर्म के पवित्र, परोक्ष रूप से माने जाने वाले अष्टापद तीर्थ की मानसिक और भक्तिपूर्ण यात्रा है, जिसे शारीरिक रूप से वहां पहुँचे बिना भक्ति और वंदना के माध्यम से अनुभूत किया जाता है ।

अष्टापद तीर्थ का महत्व बताते हुए कहा यह पवित्र स्थल है जहाँ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) ने निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था । यह स्थान कैलाश पर्वत के निकट हिमालय क्षेत्र में माना जाता है, हालांकि इसका भौतिक अस्तित्व वर्तमान में प्रत्यक्ष नहीं है । जब शारीरिक रूप से हिमालय या कैलाश स्थित अष्टापद की यात्रा संभव नहीं होती, तब भजन और प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालु मानसिक रूप से वंदना करते हैं । जैन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जो मनुष्य सच्चे भाव से अष्टापद तीर्थ की यात्रा कर लेता है, उसकी आत्मा का कल्याण होकर वह इसी भव में मोक्ष के निकट पहुँच जाता है ।
गौतम गुरुवर नमो नमः ….. तीर्थंकर भगवान के जयकारे से गूंज रहे सभागार में मुनि रविन्द्र विजय महाराज ने कहा तीर्थंकर ऋषभदेव जी जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर है । भगवान ऋषभदेव जी को आदिनाथ भी कहा जाता है । इन्के पिता का नाम नाभिराज तथा माता का नाम मरूदेवी था । तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने कठोर तपस्या की, जिससे कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ । अरिहंत सर्वज्ञ बन कर उन्होने अपने कर्मो का क्षय किया तथा अरिहंत भगवान् कहलाये ।

श्री वर्द्धमान जैन संघ के सभी ट्रस्टी, चातुर्मास समिति तथा कार्यकारिणी सदस्य सक्रिय हैं । पदाधिकारियों ने उत्सव के लाभार्थी अनीता, रोमिल, कोमल, ऋषभ, आरव महमवाल परिवार के प्रति आभार व्यक्त किया ।
