
जामुड़िया। सिंगारण नदी और उसकी सहायक जलधाराओं को अतिक्रमण, प्रदूषण तथा अवैध बालू खनन से बचाने की मांग को लेकर कुनुस्तोड़िया इलाके स्थित बाबा होटल के समीप श्मशान घाट के पास नदी तट पर जन सभा का आयोजित किया गया। सिंगारण नदी बचाओ समिति के नेतृत्व तथा पश्चिम बंगाल विज्ञान मंच के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आदिवासी, किसान, श्रमिक, शिक्षक, पर्यावरणविद्, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग शामिल हुए। सभा में नदी पर बढ़ते अतिक्रमण, प्रदूषण और अवैध बालू खनन पर चिंता व्यक्त करते हुए नदी बचाने के लिए व्यापक जन आंदोलन चलाने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम की शुरुआत “जोड़ बचाओ–नदी बचाओ, नदी बचेगी तो भविष्य बचेगा” के नारों के साथ हुई। इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि छोटी नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि खेती, मत्स्य पालन, जैव विविधता, भू-जल संरक्षण और लाखों लोगों की आजीविका का आधार भी हैं। यदि इनका अस्तित्व समाप्त होता है तो इसका असर पूरे पर्यावरण और समाज पर पड़ेगा।
वक्ताओं ने कहा कि सिंगारण नदी और उसकी सहायक जलधाराओं का पानी अंततः दामोदर नदी में मिलता है। ऐसे में यदि छोटी नदियां और प्राकृतिक जलमार्ग नष्ट होते हैं तो इसका सीधा असर पूरे नदी तंत्र सहित आम लोगों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि नदियां अतिरिक्त वर्षा के पानी को अपने भीतर समाहित कर बाढ़ के खतरे को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए छोटी नदियों का संरक्षण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस सभा में बताया गया कि सिंगारण नदी बचाओ समिति पिछले दो वर्षों से पदयात्रा, जनसभा, जागरूकता अभियान और विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से नदी संरक्षण को लेकर लोगों को जागरूक कर रही है। आज का सभा इसी अभियान का विस्तार था, जिसमें अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने का प्रयास किया गया। इस मौके पर खड़गपुर आईआईटी की पूर्व प्राध्यापिका बह्नि चक्रवर्ती, ‘नदी बचाओ–जीवन बचाओ’ आंदोलन के संयोजक मृण्मय सेनगुप्ता, नदी बचाओं कार्यकर्ता तापस दास, सिंगारण नदी बचाओ समिति के संयोजक अजीत कोड़ा, पश्चिम बंगाल विज्ञान मंच के जिला सचिव कल्लोल घोष, राज्य समिति के सदस्य धनुषधारी राय तथा अरुण किरण चटर्जी ने कहा कि नदी संरक्षण केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि लोगों के जीवन, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है। उन्होंने प्रशासन से नदी पर अतिक्रमण रोकने, प्रदूषण पर नियंत्रण लगाने और अवैध बालू खनन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। इस सभा में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। नदी किनारे बसे प्रत्येक गांव में ‘नदी प्रहरी’ दल का गठन किया जाएगा, जो नदी की निगरानी करेगा और लोगों को संरक्षण के प्रति जागरूक करेगा। इसके साथ ही स्कूलों और कॉलेजों में विद्यार्थियों के बीच जल संरक्षण और नदी बचाने को लेकर कार्यशालाएं तथा जनजागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। वक्ताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित शहरीकरण के कारण छोटी नदियां तेजी से संकट में हैं। यदि समय रहते इनके संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन की समस्या और गंभीर हो जाएगी। उन्होंने समाज के सभी वर्गों से इस अभियान से जुड़ने की अपील करते हुए कहा कि नदी बचेगी, तभी प्रकृति बचेगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा।
