
नवमी पर आज भी दी जाती है एक भैंस की बलि, बर्दवान के राजा से जुड़ी है मुखर्जी परिवार की पूजा की ऐतिहासिक मान्यता
बुदबुद (पूर्व बर्दवान)। बंगाल में दुर्गापूजा की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। कहीं भव्य पूजा पंडालों को अंतिम रूप दिया जा रहा है, तो कहीं सदियों पुरानी पारिवारिक परंपराओं को सहेजने की तैयारी है। पूर्व बर्दवान जिले के बुदबुद थाना क्षेत्र के सोंवाई गांव स्थित मुखर्जी बाड़ी में भी दुर्गोत्सव को लेकर चहल-पहल बढ़ गई है। यहां मां दुर्गा की पूजा पिछले 334 वर्षों से होती आ रही है। इस पूजा की विशेष पहचान इसकी प्राचीन परंपराएं और नवमी के दिन होने वाली भैंस बलि है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, अंग्रेजी शासन के दौरान भी इस परंपरा को बंद कराने की कोशिश हुई थी, लेकिन यह परंपरा आज तक कायम है। पहले नवमी के दिन दो भैंसों की बलि दी जाती थी, लेकिन अब एक भैंस की बलि दी जाती है। मुखर्जी परिवार की दुर्गापूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि परिवार की ऐतिहासिक विरासत और सोंवाई गांव की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है। परिवार की कई पीढ़ियां इस परंपरा को आगे बढ़ाती रही हैं। पूजा के अवसर पर परिवार के सदस्य दूर-दराज के स्थानों से अपने पैतृक आवास पहुंचते हैं। चार दिनों तक पूरा परिवार धार्मिक अनुष्ठानों और उत्सव में शामिल रहता है। आसपास के गांवों के लोग भी यहां पूजा देखने और परंपराओं से जुड़ने पहुंचते हैं। परिवार के सदस्यों के अनुसार, मुखर्जी बाड़ी की दुर्गापूजा की शुरुआत करीब 334 वर्ष पहले बासुदेव मुखर्जी ने की थी। बासुदेव मुखर्जी मूल रूप से पूर्व बर्दवान जिले के बाकलसार गांव के निवासी थे। उस समय शिक्षा ग्रहण करने के लिए वे सोंवाई गांव आए थे। गांव में एक पारंपरिक पाठशाला, जिसे टोल कहा जाता था, संचालित होती थी। बासुदेव मुखर्जी ने इसी पाठशाला में शिक्षा प्राप्त की। इसी दौरान उनका विवाह भी सोंवाई गांव में हुआ। बाद में उन्होंने यहीं बसने का निर्णय लिया। बाकलसार स्थित उनके पैतृक आवास में पहले से मां दुर्गा की पूजा होती थी। सोंवाई में स्थायी रूप से रहने लगे तो अपनी आराध्य देवी की पूजा जारी रखने के लिए उन्होंने मां दुर्गा को भी अपने साथ लाने का फैसला किया। इसके बाद देवी को कंधे पर उठाकर सोंवाई लाया जाने लगा। इसी यात्रा से जुड़ी एक घटना आज भी परिवार में प्रचलित है, जो इस पूजा के इतिहास को खास बनाती है। परिवार में प्रचलित मान्यता के अनुसार, जिस समय मां दुर्गा को कंधे पर लेकर सोंवाई लाया जा रहा था, उसी दौरान बर्दवान के तत्कालीन राजा अपने सैनिकों के साथ भ्रमण पर निकले थे। रास्ते में राजा के सैनिकों और देवी को लेकर जा रहे लोगों का आमना-सामना हो गया। दोनों पक्षों के बीच रास्ता छोड़ने को लेकर स्थिति उलझ गई। सैनिक पीछे हटने को तैयार नहीं थे, वहीं देवी को लेकर जा रहे लोग भी अपनी यात्रा रोकने को तैयार नहीं हुए। बताया जाता है कि इस स्थिति की जानकारी मिलने पर तत्कालीन राजा स्वयं वहां पहुंचे। पूरी बात जानने के बाद उन्होंने मां दुर्गा को प्रणाम किया और देवी को ले जाने वाले लोगों के लिए रास्ता छोड़ दिया। परिवार की मान्यता के अनुसार, राजा ने इसके बाद देवी की पूजा-अर्चना के लिए कुछ जमीन भी दान में दी थी। इसी घटना के बाद सोंवाई गांव में मां दुर्गा की पूजा भव्य रूप से होने लगी। समय के साथ यह पूजा गांव की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन गई। मुखर्जी परिवार में शाक्त परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की पूजा की जाती है। यहां षष्ठी की शाम से पूजा-अर्चना शुरू होती है। इसके बाद सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न किए जाते हैं। सप्तमी के दिन बेली वरण, डोला लाने, बकरे की बलि और कुमारी पूजा जैसी रस्में निभाई जाती हैं। अष्टमी के दिन भी निर्धारित परंपरा के अनुसार एक रंग के बकरे की बलि दी जाती है। नवमी के दिन महिष बलि इस पूजा का प्रमुख अनुष्ठान है। इसके साथ भेड़ की बलि देने की परंपरा भी है। गन्ने, चाल कुम्हड़े और अन्य वस्तुओं की बलि भी दी जाती है। पूजा के चारों दिन मां दुर्गा को भोग और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, इन दिनों घर का वातावरण पूरी तरह उत्सवमय रहता है। घर की महिलाएं भी पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। पारिवारिक परंपरा के तहत इन चार दिनों में उन्हें रसोई के नियमित कामकाज से छुट्टी रहती है, ताकि वे भी उत्सव का आनंद ले सकें। इसके अलावा हर वर्ष नर-नारायण सेवा का आयोजन किया जाता है, जिसमें लोगों को भोजन कराया जाता है। मुखर्जी परिवार की दुर्गापूजा में नवमी के दिन होने वाली महिष बलि सबसे चर्चित परंपराओं में से एक है। इसे देखने के लिए सोंवाई के साथ आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। परिवार के सदस्यों के अनुसार, पहले नवमी के दिन दो भैंसों की बलि दी जाती थी। हालांकि, एक वर्ष नवमी से ठीक एक दिन पहले एक भैंस के गले में रस्सी का फंदा फंसने से उसकी मौत हो गई। इसके बाद दो के स्थान पर एक भैंस की बलि देने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है। परिवार के अनुसार, अंग्रेजी शासन के दौरान इस बलि प्रथा को बंद कराने की कोशिश भी की गई थी। बताया जाता है कि तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों ने जिला प्रशासन के माध्यम से बलि प्रथा रोकने का निर्देश दिया था। इसके बाद तत्कालीन जिलाधिकारी स्वयं मुखर्जी बाड़ी पहुंचे और बलि प्रथा को फिर से जारी रखने की बात कही। परिवार में प्रचलित एक मान्यता के अनुसार, जिलाधिकारी ने बताया था कि बलि प्रथा बंद कराने के बाद से उन्हें रात में नींद नहीं आ रही थी। वे लगातार बुरे सपने देख रहे थे, जिनमें उन्हें कोई त्रिशूल लेकर अपनी ओर आता दिखाई देता था। परिवार के मुताबिक, उनकी तबीयत भी बिगड़ने लगी थी। इसके बाद बलि प्रथा बंद कराने का प्रयास रोक दिया गया।हालांकि, इस घटना से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए अंग्रेजी शासन और तत्कालीन जिलाधिकारी से जुड़ा यह प्रसंग परिवार में प्रचलित मान्यता के रूप में ही सामने आता है। मुखर्जी परिवार की दुर्गापूजा की खासियत इसकी प्राचीनता और धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ परिवार की एकजुटता भी है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि वर्षभर वे चाहे कहीं भी रहें, दुर्गापूजा के अवसर पर अपने पैतृक आवास पहुंचने का प्रयास करते हैं। चारों दिन पूरा परिवार एक साथ पूजा-अर्चना करता है और उत्सव की खुशियां साझा करता है।परिवार की महिलाएं भी इन दिनों दूसरे स्थानों पर दुर्गापूजा देखने जाने के बजाय घर के धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल रहती हैं। बताया जाता है कि मुखर्जी बाड़ी के मुख्य दरवाजे के ऊपर कभी नौबतखाना हुआ करता था, जहां से वाद्ययंत्रों की ध्वनि गूंजती थी। समय के साथ वहां की रौनक भले ही बदल गई हो, लेकिन पुराना भवन आज भी परिवार की ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाता है। 334 वर्षों से चली आ रही मुखर्जी बाड़ी की दुर्गापूजा आज भी सोंवाई गांव के लोगों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। पीढ़ियां बदल गईं, समय के साथ कई बदलाव आए, लेकिन परिवार ने अपनी पूजा की परंपराओं को बनाए रखा है। यही वजह है कि यहां का दुर्गोत्सव धार्मिक अनुष्ठानों, ऐतिहासिक मान्यताओं और पारिवारिक एकजुटता के कारण आज भी अपनी अलग पहचान रखता है।
