
– केशव कुमार भट्टड़ (सदस्य, शहीद यादगार समिती, पश्चिम बंगाल)
कोलकाता- 28 सितंबर 2026 – शहीद-ए-आज़म भगतसिंह की 119वीं जयंती है। आज ही के दिन 1907 में क्रांतिकारी विचारों के महानायक भगतसिंह का जन्म लायलपुर ज़िला (अब पाकिस्तान में) के बंगा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह वर्ष अत्यंत ऐतिहासिक और गौरवमयी है, क्योंकि 1926 में भगत सिंह और उनके साथियों द्वारा स्थापित ‘नौजवान भारत सभा’ का शताब्दी वर्ष है और साथ ही, शहीदों के वैचारिक दीप को जलाए रखने में जुटी 2001 में स्थापित ‘शहीद यादगार समिति’ का रजत जयंती वर्ष है।
भगत सिंह का ‘गुनाह’ बहुत बड़ा था; उन्होंने आम आदमी के हित में, गरीब-गुरुबां की बेहतरी के लिए, सबके लिए स्वतंत्रता, आवास, रोटी, शिक्षा और न्याय के लिए आवाज़ बुलंद की थी। क्रांति की यह सबसे बुलंद आवाज़ – जिसे सुनकर अंग्रेज हुक्मरानों का शरीर पसीने-पसीने हो जाता था – सिर्फ शोर नहीं थी। इसके पीछे आम भारतीय के बेहतर भविष्य के लिए पुख्ता वैचारिक आधार था। अन्य नेताओं से इतर यह आवाज़ आम आदमी के दिलों में विशेष हलचल पैदा करती थी। उम्र से मासूम थे तो क्या, उन्होंने साम्राज्यवादी ताक़तों के विरुद्ध अपना पौरुष दिखलाया था। साम्राज्यवादी ताकतें समझ रही थीं कि इस आवाज़ के पीछे जो विचार है, वह उनकी बुनियाद हिलाकर रख देगा। साम्राज्यवादी हुकूमत और उससे लाभ पाने वालों के लिए यह नाकाबिल-ए-बर्दाश्त था।
हिंदी, उर्दू, बंगाली, पंजाबी (गुरुमुखी) और अंग्रेजी भाषाओं के जानकार भगतसिंह ने रूस, अमेरिका, यूरोप, भारत और ब्रिटेन के महान विचारकों को समझा था। उनके निजी संग्रह में इन भाषाओं का प्रचुर साहित्य था। यूरोप में बौद्धिक जागरण हो चुका था, फ्रांस की राज्य क्रांति हो चुकी थी, मार्क्सवाद ने एक नया मार्ग दिखा दिया था और रूसी क्रांति भी हो चुकी थी। भारतीय विचारकों के साथ-साथ भगतसिंह पश्चिमी विचारकों को भी पढ़ और समझ रहे थे। इस वैचारिक तूफ़ान का आगाज़ हुकूमत को डराने वाला था; अतः इसे कुचलना उनके लिए ज़रूरी था। पूर्व निर्धारित निर्णय घोषित हुआ कि इस आवाज़ को खत्म करो; और रात के अंधेरे में मात्र 23 वर्ष, 5 महीने और 23 दिन की आयु के भगतसिंह को उनके युवा साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी दे दी गयी। अंधी ताकत के ज़ेरे-साया कानून का मखौल बनाते हुए साम्राज्यवादी शैतानों ने अपनी जन-शोषण की नीतियों को जारी रखने के लिए क्रांति की इस बुलंद आवाज़ को खामोश कर दिया। वो दिन था 23 मार्च 1931 का , शहीद दिवस के रूप में जिसका पालन किया जाता है।
लेकिन क्या सचमुच इस आवाज़ को खामोश किया जा सका? क्या उनके विचारों को कुचला जा सका? – नहीं ! वह आवाज़ आज भी ज़िंदा है और तब तक ज़िंदा रहेगी जब तक साम्राज्यवादी और शोषक ताकतें नेस्तनाबूद नहीं हो जातीं। आज भी ये आवाज़ें, ये विचार – अन्याय के विरुद्ध, शोषण के विरुद्ध, अधिकारों के हनन के विरुद्ध आम आदमी को साहस और प्रेरणा दे रहे हैं और रहती दुनिया तक देते रहेंगे। भगत सिंह ने कहा था कि विचार कभी नहीं मरते; बिल्कुल सटीक कहा था। “सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज”, “अछूत का सवाल”, “धर्म और राजनीति”, “नास्तिकता”, “विद्यार्थी और राजनीति”, “जाति और धर्म”, “हिंदू-मुस्लिम” और “सत्ता नहीं, व्यवस्था परिवर्तन” आदि विभिन्न विषयों पर भगत सिंह ने भारतीय समस्याओं को बड़े संदर्भ में देखा। भगतसिंह के विचार आज भी ज़िंदा हैं, प्रासंगिक हैं और युवाओं के आदर्श हैं। इस नौजवान को जालियांवाला बाग की मिट्टी ने गढ़ा था। अतीत की स्मृतियों से दिल पर खींची गयी ये लकीरें आज भी युवाओं के दिलों को झकझोरती हैं। भगतसिंह ने बिल्कुल सही कहा था – ज़िंदा भगतसिंह से ज़्यादा खतरनाक मरा हुआ भगतसिंह होगा। ज़िंदा तो एक भगतसिंह था, मरने पर वह हर युवा का, प्रत्येक नौजवान का प्रेरणा स्रोत बना। जिंदगी की दुश्वारियों में, वर्तमान सामाजिक ढाँचे के जीवन में, नेतृत्व और संगठन की कमजोरी के चलते हर-एक में भले ही वह पूरी तरह उभर कर सामने न आ पाता हो, लेकिन उनकी धड़कन में ओजस्वी-संगीत बनकर गूँजता है। भगतसिंह ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ सिर्फ कहने के लिए नहीं कहा, उसे अपने चरित्र में उतारा, जीवन का लक्ष्य बनाया और उसके लिए शहीद हुए।
शहीद यादगार समिति के प्रधान संरक्षक मोहम्मद सलीम कहते हैं-“दुनिया की सबसे छोटी कविता है ‘इंकलाब जिंदाबाद’। ” इसके गहरे निहितार्थ हैं। कवि ‘धूमिल’ के शब्दों में-“कविता शब्दों की अदालत में मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का हलफनामा है; कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है। ” -जी हाँ, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ आदमी होने की तमीज़ है।
बाज़ारवाद की बदतमीज़ियों के खिलाफ आम आदमी की संस्कृति है ,हथियार है-‘इंकलाब जिंदाबाद’। इसे बार-बार दोहराए जाने की ज़रूरत है, क्योंकि यह जन-गण की चेतना का महाकाव्य हैं। एकांत में युवा-मन जब खुद का साक्षात्कार करता है, अपने साथ भगतसिंह को पाता है और दुनियादारी के बोझ तले दबे-घुटे व्याकुल मन में साहस का संचार होता हुआ-सा महसूस करता है। कहीं न कहीं युवा सोचता है कि बस बहुत हुआ, अब सब कुछ बदलो। यह बदलाव की तड़प ही वास्तविक विकास की शुरुआत है। देश के करोड़ों युवा भगतसिंह के दीवाने हैं। गाँव-गलियों के ढाबों-सेलूनों से लेकर शहरों के छात्रावासों में भगतसिंह के पोस्टर मिलना इस दीवानगी का साक्षात सबूत है। भगतसिंह अब एक व्यक्ति का नाम नहीं, एक संपूर्ण विचार का नाम हैं। भगतसिंह इसीलिए देश पर मर-मिटने वालों में पहले स्थान पर हैं, शहीद-ए-आज़म हैं। देश की नीतियाँ, राजनीतिज्ञों की चतुराइयाँ, दलों की स्वार्थ-लोलुपता, क्षेत्रीयता, बाज़ारवाद, धनबल-बाहुबल का नकारात्मक बोलबाला और समाज में व्याप्त संकीर्णता जब जन-मन में आक्रोश भरती है, तो इन सब के विरुद्ध वैचारिक धरातल पर लोहा लेने वाले भगतसिंह याद आते हैं। भगतसिंह को माला पहनाते वक्त मन स्वस्थ होने लगता है , चेतना उभरने लगती है और कुछ अनकहा-अच्छा-सा लगने लगता है। उनके विचार मशाल बनकर राह दिखाते हैं। भगतसिंह की जिंदादिली और उनका चरित्र उन्हें युवा-मन का महानायक बनाते हैं।
भगतसिंह के क्रांतिकारी साथी शिव वर्मा याद आते हैं- “आज के राजनीतिक जगत में अपने चारों ओर फैली अवसरवादिता, पद और प्रतिष्ठा की होड़ में दलगत पटका-पटकी, अपने ही घनिष्ठ मित्रों के कंधों पर लात रखकर उन्हें गिराकर आगे निकल जाने की लालसा, सिद्धांत के नाम पर सिद्धांतहीनता, गुटबंदी, ढोंग, बनावटीपन देखकर मन में वितृष्णा-सी जाग उठती है। तब भगतसिंह की याद में उन्हीं द्वारा कही गयी पंक्तियाँ मेरा अपना प्रश्न बन जाती हैं – ‘वे सूरतें इलाही किस देश बसतियाँ हैं, जिनके निहारने को अँखियाँ तरसतियाँ हैं! ’”
भगतसिंह व्यक्तिगत मान-अपमान से बहुत ऊपर थे। ‘पाश’ के शब्दों में – “भारत / मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द / जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए / बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।” आज भगतसिंह की 119वीं जयंती पर, नौजवान भारत सभा के शताब्दी वर्ष और शहीद यादगार समिति के रजत जयंती वर्ष के ऐतिहासिक पड़ाव पर उनके महान एवं पवित्र आदर्शों को पूरा करने का संकल्प लें, देश के खूबसूरत व न्यायपूर्ण भविष्य का ख्वाब देखें और उसे साकार करने के प्रण के साथ शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को नमन करें। आप सभी के साथ मैं भी उन्हे ‘श्रद्धा –सुमन’ अर्पित करता हूँ। इंकलाब ज़िंदाबाद। भगतसिंह अमर रहें।
