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"भाजपा संसदीय बोर्ड पुनर्गठन के मायने" - Kolkata Saransh News

“भाजपा संसदीय बोर्ड पुनर्गठन के मायने”


क्रांति कुमार पाठक
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हमारे सामाजिक जीवन में जब भी कोई बदलाव किसी भी स्तर पर होता है तो विरोध की स्वाभाविक प्रक्रिया दिखाई देती है, लेकिन कुछ समय बाद वही बदलाव एक नई राह भी दिखाता है। भाजपा के संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन के बाद हुई प्रतिक्रिया को इस तरह से समझा जा सकता है। 26 अगस्त 2014 को गठित भाजपा संसदीय बोर्ड में आठ साल बाद बदलाव हुआ है। ग्यारह सदस्यीय इस बोर्ड में पांच स्थान खाली थे, इनमें सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और अनंत कुमार के निधन से तीन स्थान रिक्त हुए थे। जबकि धावरचंद गहलोत राज्यपाल और वेंकैया नायडू को उप राष्ट्रपति बनने के बाद संसदीय बोर्ड की जिम्मेदारी छोड़नी पड़ी थी। अटल-आडवाणी के समय में संसदीय बोर्ड में सवर्ण जातियों का प्रभाव था। यही वजह थी कि भाजपा को ब्राह्मण पार्टी कहा जाने लगा था। क्योंकि उस समय इस बोर्ड में अटल बिहारी वाजपेई, मुरली मनोहर जोशी, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज व अरुण जेटली ब्राह्मण थे। अब जब संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन किया गया है, तब इसमें जाति और क्षेत्र दोनों को ध्यान में रखा गया है। पहले कोई मुसलमान, सिख, ईसाई सदस्य इस बोर्ड में नहीं था। पहली बार आदिवासी के नाम पर सर्वानंद सोनोवाल को तो इकबाल सिंह लालपुरा को सिख प्रतिनिधि के रूप में तो सुधा यादव और के लक्ष्मण को ओबीसी प्रतिनिधि के रूप में जबकि सत्यनारायण जटिया को दलित प्रतिनिधि के रूप में शामिल किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ओबीसी वर्ग से हैं। क्षेत्रवार देखें तो इस बार पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों को भी प्रतिनिधित्व मिला है। वहीं हिमाचल प्रदेश से स्वयं पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और गुजरात से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह हैं। इसका मतलब साफ है कि इस बार बोर्ड में अलग अलग राज्यों व जातियों का समावेश किया गया है। इस संसदीय बोर्ड में जेपी नड्डा अकेले ब्राह्मण हैं जबकि पहले 11 में से 5 ब्राह्मण चेहरे होते थे और उत्तर भारत का दबदबा ज्यादा रहता था।
इसका एक दूसरा पहलू यह है कि भाजपा में 75 साल की उम्र को सक्रिय राजनीति की उम्र सीमा मानी गई है, लेकिन 79 वर्षीय कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया है। इसी तरह मुरली मनोहर जोशी को जब मार्गदर्शक मंडल में भेजा गया था, तब उनकी उम्र 80 साल थी। फिर मुस्लिम प्रतिनिधियों को इस बोर्ड में कोई अहमियत नहीं दी गई है। इस सबके बावजूद सबसे ज्यादा चर्चा संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी को जगह नहीं मिलने को लेकर हो रही है।
वर्ष 2013 में शिवराज सिंह चौहान और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एक साथ भाजपा संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया था। उस समय पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी शिवराज सिंह चौहान के शासन चलाने और उनके द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों की खूब तारीफ किया करते थे। यही वजह थी कि उस समय शिवराज सिंह चौहान को लेकर कयास लगाए जाने लगे थे कि आम चुनाव में वह भाजपा के प्रधानमंत्री पद का चेहरा बन सकते हैं। मगर सबको आश्चर्य तब हुआ, जब आम चुनाव के ठीक पहले पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि नरेंद्र मोदी पार्टी के प्रधानमंत्री पद का चेहरा होंगे। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ये संयोग ही है कि राजनाथ सिंह के अलावा ‘पुरानी भाजपा’ के ज्यादातर चेहरे नये संसदीय बोर्ड से अब नदारद हैं।
विश्लेषकों का ये भी कहना है कि सबको ये विश्वास था कि इस बार विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए इतनी ‘शानदार जीत’ हासिल करने वाले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संसदीय बोर्ड में निश्चित रूप से शामिल किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हुआ कुछ ऐसा कि पार्टी के सबसे कद्दावर नेता और पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान को हटाकर छः नये चेहरों को शामिल किया गया। मोटे तौर पर यह पहला अवसर है, जब पूर्व अध्यक्ष को संसदीय बोर्ड में नहीं रखा गया है। अक्सर यह माना जाता है कि नितिन गडकरी को 2009 में भाजपा अध्यक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दबाव में बनाया गया था और जब उन्हें दोबारा अध्यक्ष बनाया जाना था, तब लालकृष्ण आडवाणी ने नितिन गडकरी को संघ का उम्मीदवार बताकर ही अध्यक्ष पद से दूर रखने की कोशिश की थी।
वैसे इस सरकार में नितिन गडकरी को बेहतर प्रदर्शन करने वाले मंत्री के तौर पर जाना जाता है, तुलनात्मक रूप से उन्हें ज्यादा आजादी प्रधानमंत्री कार्यालय से मिली हुई है, मगर नितिन गडकरी को शीघ्र नेतृत्व की लाइन पर चलने वाले लोगों में नहीं माना जाता। इस पर उन्होंने अपनी राय रखी भी है। पिछली बार मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में विधानसभा चुनाव हारने के बाद नितिन गडकरी ने कहा था कि जीत का सेहरा बांधने वालों को हार की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। पिछले दिनों ही नागपुर के एक कार्यक्रम में नितिन गडकरी कहा था कि वह राजनीति छोड़ना चाहते हैं, क्योंकि अब राजनीति सिर्फ सत्ता का माध्यम रह गई है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यही फर्क राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी को अलग करता है। शीर्ष नेतृत्व से ताल मिलाकर चलने वाले राजनाथ सिंह संसदीय बोर्ड में बने रहते हैं और गडकरी बाहर हो जाते हैं।
इसी तरह संसदीय बोर्ड में शिवराज सिंह चौहान एक मात्र ऐसे नेता थे जो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से भी पहले से थे। ये झटका तो जरूर है शिवराज सिंह चौहान के लिए, मगर उससे भी ज्यादा ये संकेत दिया गया है कि संगठन में उनका कद अब क्या रह गया है। हालांकि पार्टी के नेता संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन के बाद ये दलील दे रहे हैं कि जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं या फिर जिन राज्यों में भाजपा को विपक्षी दलों से जोरदार टक्कर मिल रही है उन राज्यों के लोगों को शामिल किया गया है या बदला गया है।
चर्चा यह भी है कि शिवराज सिंह चौहान को बाहर करके पार्टी ने योगी आदित्यनाथ के प्रवेश को भी रोक दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने किसी भी कार्यरत मुख्यमंत्री को संसदीय बोर्ड में शामिल नहीं करने के फैसले से ‘एक तीर से दो निशाने’ लगाए हैं और इसी रणनीति के तहत शिवराज सिंह चौहान और योगी आदित्यनाथ को संसदीय बोर्ड में शामिल नहीं किया गया है। इसी तरह इस बार किसी केंद्रीय मंत्री को भी शामिल नहीं किया गया जबकि निर्मला सीतारमण और स्मृति ईरानी का संसदीय बोर्ड में शामिल होना तय माना जा रहा था।नितिन गडकरी के लिए एक परेशानी यह भी है कि उनके प्रतिद्वंद्वी देवेंद्र फडणवीस को संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया है। इस तरह देवेंद्र, येदियुरप्पा, सर्वानंद सोनोवाल को अहमियत देकर पार्टी ने यह जताने की कोशिश की है यहां ‘यस बाॅस’ की संस्कृति हावी है। फिर देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के साथ उप मुख्यमंत्री बनने की बात स्वीकार की। वहीं सर्वानंद सोनोवाल ने हेमंत बिस्वा सरमा के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी। येदियुरप्पा ने बासवराज बोम्मई के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया था। जाहिर है, शीर्ष नेतृत्व की राय को स्वीकार करना अपनी जगह बनाने के लिए जरूरी है। जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि ‘संगठन का विस्तार हो रहा है। संगठन अलग-अलग राज्यों के लिए अलग तरह की नीतियों पर काम करता है। इसलिए न‌ए चेहरों की जरूरत होती है। कुछ उलटफेर करना भी जरूरी होता है। इसको उसी निगाह से देखा जाना चाहिए’।

 

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