
सीताराम अग्रवाल
कोलकाता। नन्दीग्राम तथा रेजिनगर विधानसभा सीटों के लिए उपचुनावों के लिए चुनाव आयोग ने पूरा कार्यक्रम बहुत पहले घोषित कर दिया है। सभी दलों ने अपने प्रत्याशी भी घोषित कर दिये हैं। पर आश्चर्य की बात यह है कि तृणमूल के दोनों गुट अपने प्रत्याशियों के लिए कौन सा चुनाव चिन्ह आवंटित करेंगे, इस पर अभी तक संशय बना हुआ हैं, क्योंकि चुनाव आयोग ने दोनों गुटों के दावे पर अभी तक कोई निर्णय नहीं सुनाया है। आज ही नामांकन की अंतिम तिथि है।
मुझे ऐसा लगता है कि तृणमूल (ममता गुट हो या ॠतव्रत गुट ) के दोनों धड़े दोनों सीटों पर होनेवाले उपचुनावों के लिए गंभीर नहीं हैं। भले ही दोनों गुटों ने अपने आप को असली तृणमूल मानते हुए अपने- अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी हो, पर हकीकत वे भी जानते हैं कि जीतना तो दूर की बात, जमानत बचने में भी संशय है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि अपनी इज्जत बचाने के लिए तृणमूल के दोनों गुट ने एक अभिनव तरीका सोचा है।
ममता (कालीघाट) गुट का कहना है कि चूंकि ममता बनर्जी के पास जोड़ाफूल चुनाव चिन्ह आवंटित करने का अधिकार है तथा न तो कोर्ट ने ना ही चुनाव आयोग ने इस अधिकार पर कोई रोक लगायी है, अत: हमारे उम्मीदवार जोड़ाफूल चिन्ह पर ही चुनाव लड़ेंगे। उधर ॠतव्रत गुट का मानना है कि विधायकों की संख्या बल तथा विधानसभा में विरोधी दल की मान्यता मिलने तथा हाल ही में एक निचली अदालत का फैसला उनके पक्ष में होने से वे ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं। अत: कोई अधिकृत फैसला होने तक इन उपचुनावों में उन्हें ही जोड़ाफूल चिन्ह व्यवहार करने का हक बनता है। ऐसे हालात में यदि जान बूझ कर दोनों गुट एक ही चुनाव चिन्ह व्यवहार करते हैं तो स्वाभाविक रूप से उनके नामांकन रद्द हो जायेंगे। इस प्रकार सांप भी मर जायेगा और लाठी भी टूट जायेगी वाली कहावत चरितार्थ करते हुए संभावित हार की बेइज्जती होने से भी बच जायेगी तथा असली होने का दावा भी बरकरार रहेगा। वैसे अभी कुछ समय बचा है और अंतिम समय में चुनाव आयोग दोनों ही गुट के लिए अलग-अलग स्वतंत्र चुनाव चिन्ह आवंटित कर देता है तो बात अलग है।
ज्ञातव्य है कि है कि कांग्रेस से अलग हो कर 1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया तथा पार्टी की चेयरपर्सन पद पर पिछले विधानसभा चुनाव परिणाम आने तक निर्विवाद रूप से कायम रहीं। साथ ही 15 वर्षों तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहीं तथा चुनावों में सभी उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित करती रहीं। यहां तक कि 2026 के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी के प्राथियों को उन्हीं के हस्ताक्षर से चुनाव चिन्ह बंटे। पर चुनाव परिणाम ने उनका भाग्य ही बदल दिया। न सिर्फ़ सत्ता गयी, बल्कि मात्र 80 सीटों पर ही सन्तोष करना पड़ा। यूं तो चुनावों में पार्टियों की हार- जीत होती रहती हैं। पर ममता की तृणमूल का हस्र तो बहुत बुरा हुआ। 80 में से करीब 60 विधायकों ने ॠतव्रत के नेतृत्व में विद्रोह कर अलग गुट बना कर संख्या बल के आधार पर अपने को असली तृणमूल होने का दावा कर दिया। भाजपा ने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए अप्रत्यक्ष रूप से इस गुट की मदद की और विधानसभा में इसे विरोधी दल की मान्यता भी मिल गयी। उधर लोकसभा में भी 28 सांसदों में से 20 ने विद्रोह कर एक अज्ञात सी पार्टी के सांसद बन गये। वैसे कानूनी दाव – पेंच में इन सांसदों का भाग्य अभी अधर में है। राज्यसभा में भी भाजपा ने 3 तृणमूल सांसदों का इस्तीफा दिलवा कर फटाफट उन्हें अपनी पार्टी में शामिल कर पुनः राज्यसभा में भेज भी दिया। इस प्रकार ममता की पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी। इसके लिए ममता के साथ उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की तानाशाही को ही उनकी ही पार्टी के बगावती लोग जिम्मेदार मानते हैं।कितनी बड़ी विडम्बना है कि जो ममता हाल तक अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को जोड़ाफूल चुनाव चिन्ह आवंटित करती रही हैं, फिलहाल उनके इस अधिकार को चुनौती मिल रही है। यही नहीं तृणमूल पार्टी भी उनके हाथ में रहेगी, इस पर भी खतरे के बादल मंडराये हुये हैं। राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं, अतः इन उपचुनावों में अंतिम क्षणों में कुछ भी परिवर्तन हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
