
कलका भारत में हुए कई ऐतिहासिक विवरण के साक्षी हैं। आखिर कलका है क्या? कलका शब्द का अर्थ है बूटा यानी बिंदी की तरह देखने वाली एक चिन्ह। अधिकतर महिलाएं सजने सवरने के लिए इसका प्रयोग करती है। आम की तरह देखने में एक खास किस्म की नक्शा। ज्यादातर बंगाली रिचुअल्स में इसका व्यवहार होता है।
कहां से आया कलका?
कलका पारसी लोग यूज करते थे। भारत में जब मुगल साम्राज्य कायम था तब मुगलों ने कलका कल्चर को भारत में लेकर आया। दरअसल मुगल कलका का इस्तेमाल अपनी खुफिया नक्शा बनाने में इस्तेमाल करती थी। एक ऐसा सांकेतिक चिन्ह इसके बारे में केवल बादशाह और उनके साथी को ही जानकारी होती थी। बाद में इन सभी सांकेतिक चिन्ह को बंगाल के कारीगरों ने सीख ली। फिर इसे कपड़ों के डिजाइन में इस्तेमाल करने लगे। कलमकारी कलका, साबेकी कालका आज भी बंगाल के संस्कृति को एक अलग पहचान देती हैं। ईरान में शुरू इस अनोखे कलका आज भी विविध संप्रदाय समूह भारतवर्ष के खास पहचान बन चुकी है। 17 और 18 के दशकों में कश्मीर के शॉल में कलका का काम काफी चर्चित थी।

कलका कल्चर और पश्चिमबंगाल
कलका कल्चर और पश्चिमबंगाल एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ईरान की संस्कृति मुगलों के हाथ से होते हुए पश्चिम बंगाल में प्रवेश की। बंगाल का तांत की साड़ी में कॉल का का काम धीरे-धीरे लोकप्रिय होने लगी। विश्व में इस काम को पैसले भी कहा जाता हैं। कॉल का डिजाइन खास कर पश्चिम बंगाल के महिलाओं को काफी आकर्षित किया था। यही कारण है कि बंगाली रिचुअल्स में कलका शुभ माना जाता है। इसलिए कलका बंगाली शादी में दुल्हन के फोरहेड पर और चिक पर किया जाता हैं। आम की तरह देखने में कलका शुभ काम के प्रतिक मानी जाती है।

फैशन इंडस्ट्री में कलका कैसे करते है?
ब्यूटी एंड फैशन इंडस्ट्री आज बहुत आगे निकल चुकी है। इसके बावजूद घर की संस्कृति से जुड़े बच्चों के लिए कलका बनाना मुश्किल नहीं है।
घर में पूजा अर्चना के समय देवी के आराधना के लिए जो शुभचिन्ह बनाया जाता है उन्हें ही कलका कहते हैं। इसे बनाने के लिए सिंपल एक फार्मूला होता है। कुछ सांकेतिक चिन्ह इस फार्मूले में काम करती है। पहले है दूसरा है –और तीसरा है
इन्हीं सांकेतिक कॉन का इस्तेमाल करके कलका बनती है। चंदन और अलता से कलका बनाया जाता है। वर्तमान में फैशन इंडस्ट्री पेन से भी कॉल का डिजाइन करते हैं।
