
कोलकाता । श्री वर्द्धमान जैन संघ में चातुर्मास प्रवास में पधारे जैनमुनि रविन्द्र विजय महाराज, मुनि महेन्द्र विजय महाराज के सानिध्य में श्रावक – श्राविका तप साधना, धर्म की आराधना कर रहे हैं । मुनि रविन्द्र विजय महाराज ने अपने प्रवचन में कहा जैन धर्म में तप – तपस्या, आत्म-अनुशासन और आत्म-शुद्धि के साधन है । तप – तपस्या का उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति है । तप साधना का प्रमुख उद्देश्य कर्मों की निर्जरा (कर्मों का क्षय) और आत्मा की शुद्धि करना है । तप साधना आत्म-शुद्धि, मन और इंद्रियों के संयम तथा उच्च आध्यात्मिक लक्ष्यों को पाने की एक कठोर एवं अनुशासित प्रक्रिया है, जिसमें शारीरिक, मानसिक स्तर पर कठिनाइयों को स्वेच्छा से सहन किया जाता है ।

मन, वचन और काया को पवित्र करने के लिए तप किये जाते हैं । जैन धर्म का सिद्धांत है बड़े-बुजुर्गों और धर्म के प्रति आदरभाव रखना एवं साधु, संत, साधर्मिक सेवा, बीमार व्यक्तियों की निष्काम सेवा करना । क्रोध – अहंकार का त्याग करने की प्रेरणा देते हुए मुनिश्री ने कहा स्वाध्याय में धार्मिक शास्त्रों का पठन-पाठन और ज्ञान प्राप्त करना चातुर्मास का उद्देश्य है । विजय सिंह बैद, मुल्तान चन्द सुराणा, रतन चन्द बांगानी, मोहनलाल कोचर, संजय आशीष कोचर, महेन्द्र डागा, शिखर चन्द बांठिया, सौरभ सुराणा, आनन्द बांगानी, सुरेश बांगानी, पारस सावनसुखा, संजय रामपुरिया, मांगीलाल कोचर, अशोक बांठिया एवं कार्यकर्ता सक्रिय हैं ।
