
कोलकाता । श्री वर्द्धमान जैन संघ में श्रावक – श्राविकाओं के मार्गदर्शन हेतु जैनमुनि रविन्द्र विजय महाराज, मुनि महेन्द्र विजय महाराज के महानगर आगमन से गुरु का सानिध्य संस्कार एवं चरित्र निर्माण का केन्द्र है । चातुर्मास में धर्म आराधना, तप साधना एवम् धार्मिक कार्यक्रमों, प्रवचन में प्रभु वाणी को श्रवण करने तथा कर्तव्य पालन की प्रेरणा देते हुए जैन मुनि रविन्द्र विजय महाराज ने श्रावक – श्राविकाओं से कहा गुरु कृपा से आत्म बोध जीवन में आत्म कल्याण के लिये जरूरी है ।

मुनिश्री ने कहा भारतीय दर्शन और धार्मिक मान्यता के अनुसार पंच तत्व के पांच मूल आधार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश है । मानव शरीर इन्हीं पांच तत्वों से मिलकर बना है । पंचतत्व को जागृत और संतुलित करने के लिये प्रकृति के साथ जुड़ना होगा, जिसमें आत्म साधना, तप मुख्य उपाय हैं तथा धर्म की आराधना से आत्मशुद्धि, मानव जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होती है । श्रावक – श्राविकाओं को भाव विभोर करते हुए मुनिश्री ने कहा पांच विशेष इंद्रियों से देखने, छूने, स्वाद लेने, सूंघनेऔर श्रवण करने (सुनना) का अनुभव होता है । इन पांच इंद्रियों पर नियंत्रण, संतुलन रखना जरूरी है । सांसारिक जीवन में आत्मीय सुख – शान्ति, परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिये प्रभु की आराधना, साधना जरूरी है । श्री वर्द्धमान जैन संघ संघ के सभी ट्रस्टी, चातुर्मास समिति के संयोजक एवं कार्यकारिणी सदस्यों ने चातुर्मास व्यवस्था में सक्रिय सहयोग करने का निवेदन किया । अशोक बांठिया, आशीष कोचर, सौरभ सुराणा, सुरेश बांगानी, जिनेन्द्र सावनसुखा, शिखरचंद बांठिया, सुनील बांठिया, आनन्द बांगाणी, पारस कोचर, मोतीचंद दुगड़ एवम् कार्यकर्ता सक्रिय हैं ।
