
रानीगंज। राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के दौरान मुआवजा वितरण में कथित अनियमितता का एक मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। रानीगंज के कुमार बाजार मौजा निवासी कौशिक भदानी ने आरोप लगाया है कि उनकी पैतृक भूमि पर बने गोदाम का मुआवजा वास्तविक मालिक को देने के बजाय किराएदार को दे दिया गया, जिसके कारण उन्हें पिछले तीन वर्षों से न्याय के लिए विभिन्न सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
पीड़ित कौशिक भदानी के अनुसार, उनके पिता स्वर्गीय योगेंद्र प्रसाद गुप्ता के नाम पर दर्ज भूमि का एक हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के अंतर्गत अधिग्रहित किया गया था। उन्होंने दावा किया कि कुमार बाजार मौजा स्थित उनकी कुल 2.60 शतक भूमि में से 1.18 शतक भूमि सड़क निर्माण परियोजना के लिए ली गई, जिस पर लगभग 7,920 वर्ग फुट क्षेत्रफल का एक विशाल गोदाम निर्मित था। परियोजना के तहत गोदाम को ध्वस्त कर दिया गया, लेकिन उसके बदले मिलने वाला मुआवजा उन्हें प्राप्त नहीं हुआ। भदानी का आरोप है कि भूमि का मुआवजा तो वैधानिक रूप से भूमि स्वामी को दिया गया, लेकिन गोदाम संरचना का मुआवजा कथित रूप से उस किराएदार को दे दिया गया, जो केवल उक्त परिसर का उपयोग कर रहा था। उनका कहना है कि यह निर्णय न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि इससे वास्तविक संपत्ति स्वामी के अधिकारों का भी हनन हुआ है। पीड़ित ने आरोप लगाया कि अधिग्रहण प्रक्रिया के दौरान दो अलग-अलग गोदामों के मुआवजे के निर्धारण में भी गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं। उनका दावा है कि जिस गोदाम को पूरी तरह परियोजना के लिए हटाया गया, उसका मुआवजा वास्तविक मालिक को नहीं दिया गया, जबकि दूसरे मामलों में अलग प्रक्रिया अपनाई गई। इससे पूरे मामले की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कौशिक भदानी का कहना है कि वह पिछले तीन वर्षों से न्याय की मांग कर रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने रानीगंज थाना, जिला प्रशासन, आसनसोल-दुर्गापुर पुलिस आयुक्तालय, भूमि अधिग्रहण विभाग तथा केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय सहित विभिन्न सरकारी संस्थाओं को लिखित शिकायतें भेजीं, लेकिन अब तक उन्हें कोई ठोस जवाब नहीं मिला। उन्होंने कहा कि यदि किसी संपत्ति का वैध स्वामी मौजूद है, तो उसके स्थान पर किसी तीसरे पक्ष को मुआवजा कैसे प्रदान किया जा सकता है। उनका आरोप है कि पूरे मामले में गंभीर प्रशासनिक लापरवाही हुई है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। मीडिया से बातचीत में कौशिक भदानी ने कहा, “मैं पिछले तीन वर्षों से लगातार न्याय के लिए प्रयास कर रहा हूं। संबंधित विभाग के अधिकारियों से कई बार संपर्क किया, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला। मेरी मेहनत और निवेश से निर्मित संपत्ति का मुआवजा किसी अन्य व्यक्ति को दे दिया गया। जब मुझे कहीं से न्याय नहीं मिला, तब मुझे अपनी बात सार्वजनिक करने और मीडिया के सामने रखने के लिए मजबूर होना पड़ा।” उन्होंने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने, मुआवजा वितरण प्रक्रिया की समीक्षा करने तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है। साथ ही उन्होंने यह भी आग्रह किया है कि वास्तविक संपत्ति स्वामी के रूप में उन्हें उनका वैधानिक अधिकार और बकाया मुआवजा प्रदान किया जाए।
फिलहाल इस मामले में संबंधित विभागों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, भूमि अधिग्रहण और मुआवजा वितरण से जुड़े इस विवाद ने प्रशासनिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय इस शिकायत पर क्या कदम उठाते हैं तथा पीड़ित को न्याय कब तक मिल पाता है।
