चुनाव 26 : समृद्ध राजनीतिक इतिहास का साक्षी रहे दुर्गापुर पश्चिम सीट पर रही है परिवर्तन की परंपरा

 

आसनसोल, 04 अप्रैल ।दुर्गापुर पश्चिम विधानसभा सीट का इतिहास काफी समृद्ध और राजनीतिक रूप से दिलचस्प रहा है। वर्ष 1967 में फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र के रूप में यह सीट अस्तित्व में आई थी जो आसनसोल–दुर्गापुर औद्योगिक क्षेत्र के नए राजनीतिक पुनर्गठन का हिस्सा था। बाद में वर्ष 1977 में इसका नाम बदलकर दुर्गापुर-2 कर दिया गया और वर्ष 2011 के परिसीमन के बाद इसका वर्तमान नाम दुर्गापुर पश्चिम पड़ा।

इस सीट की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि यहां के मतदाताओं ने कभी किसी एक पार्टी को स्थायी रूप से सत्ता नहीं सौंपी, बल्कि समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों को मौका दिया। 1967 से 2021 तक कुल 14 चुनावों में माकपा को सात बार जीत मिली, जबकि बंगाल कांग्रेस, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को दो-दो बार सफलता मिली और 2021 में भाजपा ने पहली बार यहां जीत दर्ज की।

शुरुआती दौर में इस सीट पर कांग्रेस और बंगाल कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला। 1967 के पहले चुनाव में बंगाल कांग्रेस के मनोरंजन बक्शी ने कांग्रेस के लावण्या गोपाल घटक को बेहद कम अंतर से हराकर जीत हासिल की और पहले विधायक बने। 1969 के मध्यावधि चुनाव में भी यही मुकाबला दोहराया गया और मनोरंजन बक्शी ने दूसरी बार जीत दर्ज की।

1971 के मध्यावधि चुनाव में पहली बार माकपा ने यहां अपना उम्मीदवार उतारा और सनत कुमार बनर्जी ने कांग्रेस के दास घटक को 8196 वोटों से हराकर सीट पर कब्जा किया। हालांकि 1972 के चुनाव में कांग्रेस ने वापसी करते हुए अजीत कुमार बंदोपाध्याय के नेतृत्व में माकपा के तरुण कुमार चटर्जी को हराकर सीट अपने नाम कर ली।

1977 के चुनाव में माकपा ने फिर वापसी की और तरुण कुमार चटर्जी ने कांग्रेस के अजीत बंद्योपाध्याय को हराकर जीत हासिल की। इसके बाद 1982, 1987 और 1991 में तरुण चटर्जी ने लगातार जीत दर्ज कर एक बड़ा रिकॉर्ड बनाया, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के वरुण राय, नारायण हाजरा चौधरी और लचित चटर्जी को हराया। यह लगातार चार जीत का रिकॉर्ड आज भी कायम है। 1996 में माकपा ने उम्मीदवार बदलते हुए देवब्रत बनर्जी को मैदान में उतारा, जिन्होंने कांग्रेस के मलाई कांति दत्त को हराकर माकपा की जीत की परंपरा जारी रखी।

2001 के चुनाव में पहली बार तृणमूल कांग्रेस ने इस सीट पर जीत दर्ज की। तृणमूल के अपरूप मुखर्जी ने माकपा उम्मीदवार को 9471 वोटों से हराकर वामपंथी दबदबे को तोड़ा। हालांकि 2006 में माकपा के भूपेंद्र कुमार चक्रवर्ती ने वापसी करते हुए अपरूप मुखर्जी को हराकर सीट फिर से अपने कब्जे में ले ली। 2011 में परिसीमन के बाद बनी दुर्गापुर पश्चिम सीट पर तृणमूल के अपरूप मुखर्जी ने एक बार फिर जीत हासिल की और माकपा के उम्मीदवार को 17006 वोटों से हराया।

2016 के चुनाव में वाम मोर्चा और कांग्रेस के गठबंधन के तहत यह सीट कांग्रेस को मिली। कांग्रेस के विश्वनाथ पड़ियाल ने तृणमूल के अपरूप मुखर्जी को 34842 वोटों के बड़े अंतर से हराकर सीट पर कब्जा किया और लंबे समय बाद कांग्रेस की वापसी हुई।

2021 के चुनाव में इस सीट पर नया राजनीतिक अध्याय जुड़ा, जब भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की। भाजपा के लखन घोरुई ने तृणमूल के विश्वनाथ पड़ियाल को 14664 वोटों से हराकर सीट अपने नाम की। इस चुनाव में बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिला, जिसमें कांग्रेस, निर्दलीय और अन्य दलों के उम्मीदवार भी मैदान में थे।

कुल मिलाकर दुर्गापुर पश्चिम विधानसभा सीट का इतिहास यह दर्शाता है कि यहां के मतदाता हर दौर में बदलाव को प्राथमिकता देते रहे हैं। यही वजह है कि माकपा के लंबे शासन से लेकर तृणमूल के उभार और फिर भाजपा के प्रवेश तक, इस सीट ने हर राजनीतिक बदलाव को करीब से देखा है और पश्चिम बर्धमान की सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिस्पर्धी सीटों में अपनी पहचान बनाए रखी है।

 

 

 

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