
प्रदीप ढेडिया
ट्रस्टी – समर्पण ट्रस्ट
आधुनिकता के तीव्र वेग में बहता आज का मानव जीवन बाह्य रूप से जितना समृद्ध और प्रगतिशील प्रतीत होता है, आंतरिक रूप से उतना ही व्यग्र, तनावग्रस्त और दिशाहीन भी हो चला है। प्रतिस्पर्धा, भौतिक आकांक्षाएँ और निरंतर उपलब्धियों की दौड़ ने मनुष्य के भीतर के संतुलन को कहीं न कहीं विचलित किया है। ऐसे समय में सनातन संस्कृति के पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को पुनः संतुलित करने के दिव्य अवसर बनकर सामने आते हैं। इन्हीं में से एक है हनुमान जयंती—जो शक्ति, भक्ति, सेवा और समर्पण का अद्वितीय संगम है।
यह पर्व केवल भगवान हनुमान के जन्मोत्सव का उत्सव नहीं, बल्कि उनके चरित्र और आदर्शों के माध्यम से मानव जीवन को ऊर्जस्वित करने का एक दिव्य अवसर है। हनुमान जी, जिन्हें ‘संकटमोचन’, ‘अष्टसिद्धि-नव निधि के दाता’ और ‘रामभक्त’ के रूप में जाना जाता है, भारतीय संस्कृति में बल, बुद्धि और भक्ति के समन्वय का सर्वोच्च प्रतीक हैंl
आज का मनुष्य मानसिक तनाव, चिंता और अस्थिरता से जूझ रहा है। ऐसे में हनुमान चालीसा का पाठ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक प्रकार की मानसिक चिकित्सा बन गया है। हनुमान जी का स्मरण व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करता है, जिससे वह कठिन परिस्थितियों में भी अडिग बना रहता है। उनका जीवन सिखाता है कि बाहरी चुनौतियों का सामना करने से पहले भीतर की दृढ़ता आवश्यक है।
हनुमान जी का सम्पूर्ण जीवन भगवान राम के प्रति निस्वार्थ सेवा का उदाहरण है। उन्होंने कभी अपने पराक्रम का प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि सदैव उसे धर्म और कर्तव्य के लिए समर्पित किया। आधुनिक समाज, जहाँ स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, वहाँ हनुमान जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि सच्चा सुख दूसरों की सेवा में निहित है।
‘संकटमोचन’ के रूप में पूज्य हनुमान जी यह संदेश देते हैं कि जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ केवल परीक्षा हैं, अंत नहीं। लंका दहन, समुद्र लांघना और संजीवनी लाना—ये सभी प्रसंग इस बात के प्रतीक हैं कि दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास से असंभव भी संभव हो सकता है। आधुनिक जीवन की जटिलताओं—चाहे वे आर्थिक हों, सामाजिक या मानसिक—से जूझने के लिए यह प्रेरणा अत्यंत प्रासंगिक है।
हनुमान जयंती हमें यह भी सिखाती है कि शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उसका सदुपयोग ही सच्ची वीरता है। हनुमान जी के पास अपार बल था, परंतु उन्होंने उसे केवल धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए प्रयोग किया। आज के युवाओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदेश है कि शक्ति का उपयोग अहंकार के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए होना चाहिए।
सनातन परंपरा में हनुमान जी को केवल एक देवता नहीं, बल्कि ‘जीव और ब्रह्म के मिलन’ का प्रतीक भी माना गया है। जब वे अपने हृदय को चीरकर उसमें राम-सीता का दर्शन कराते हैं, तो वह दृश्य यह बताता है कि ईश्वर बाह्य जगत में नहीं, बल्कि हमारे अंतःकरण में विद्यमान हैं। आधुनिक मनुष्य, जो बाहर सुख और शांति खोजता है, उसके लिए यह एक गहन आध्यात्मिक संदेश है।
आज की पीढ़ी तकनीकी रूप से जितनी सशक्त है, उतनी ही अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है। हनुमान जयंती जैसे पर्व उन्हें अपनी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों से जोड़ने का माध्यम बनते हैं। यह आवश्यक है कि हम केवल भौतिक संपत्ति ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान और संस्कार भी अगली पीढ़ी को सौंपें—यही सच्ची ‘संस्कृति की वसीयत’ है।
हनुमान जयंती पर आयोजित शोभायात्राएँ, भजन-कीर्तन और सामूहिक पूजा समाज में एकता और भाईचारे को सुदृढ़ करती हैं। यह पर्व जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर उठकर सभी को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है। आधुनिक समाज में, जहाँ विभाजन की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं, वहाँ ऐसे उत्सव सामाजिक समरसता के संवाहक बनते हैं।
हनुमान जी का चरित्र यह दर्शाता है कि अपार शक्ति और ज्ञान होने के बावजूद विनम्रता कैसे बनाए रखी जाती है। वे स्वयं को ‘राम का दास’ मानते हैं—यही उनकी महानता का रहस्य है। यह संदेश आज के समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ सफलता अक्सर अहंकार को जन्म देती है।
निष्कर्षतः हम कह सकते है कि हनुमान जयंती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सार्थक और ऊर्जावान बनाने का पर्व है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में बल, बुद्धि और भक्ति—इन तीनों का समन्वय आवश्यक है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में, यदि हम हनुमान जी के आदर्शों को आत्मसात करें, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में शांति और संतुलन प्राप्त होगा, बल्कि समाज भी अधिक समरस और सशक्त बन सकेगा।
