SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: प्रक्रिया में बाधा बर्दाश्त नहीं, बंगाल DGP को कारण बताओ नोटिस

मतदाता सूची संशोधन को बताया संवैधानिक अभ्यास, अंतिम सूची की समय-सीमा एक सप्ताह बढ़ी

नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कड़ा रुख अपनाया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि SIR एक संवैधानिक प्रक्रिया है और इसमें किसी भी राज्य द्वारा बाधा डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने चुनाव आयोग का जवाब दर्ज किया और बंगाल में अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की समय-सीमा एक सप्ताह के लिए बढ़ा दी। ममता बनर्जी ने आशंका जताई है कि गलत वर्तनी और पते में बदलाव जैसी त्रुटियों के कारण 1.36 करोड़ से अधिक मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं, साथ ही उन्होंने ईसीआई द्वारा नियुक्त सूक्ष्म-पर्यवेक्षकों की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
करीब डेढ़ घंटे चली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मतगणना फॉर्म जलाए जाने की घटनाओं पर कड़ी नाराजगी जताई और राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को कारण बताओ नोटिस जारी कर हलफनामा तलब किया। कोर्ट ने पूछा कि इतनी गंभीर घटनाओं पर अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को आवश्यकता पड़ने पर ERO और AERO की नियुक्ति या बदलाव की अनुमति दी, जबकि दस्तावेज सत्यापन के लिए 14 फरवरी के बाद एक सप्ताह का अतिरिक्त समय भी प्रदान किया गया।
राज्य सरकार द्वारा सौंपे गए 8,505 ग्रुप-बी अधिकारियों को लेकर कोर्ट ने निर्देश दिया कि वे मंगलवार शाम 5 बजे तक रिपोर्टिंग सुनिश्चित करें। चुनाव आयोग ने इन अधिकारियों को दो दिन का प्रशिक्षण देने की जानकारी दी। अधिकारियों के निलंबन के सुझाव पर अदालत ने कहा कि राज्य सरकार कानून के अनुसार निर्णय ले।
फिलहाल पूरा मामला न्यायिक निगरानी में है और सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं होगा।

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