भूमिहार ब्राह्मण चालीसा रचे पंडित आर्य गिरि

पंडित आर्य गिरि जी ने भूमिहार ब्राह्मण ब्रह्मर्षि समाज ” के अध्यक्ष दयाशंकर राय को भेंट

आसनसोल। घाघरबुढी मंदिर प्रांगण में निंगेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी एवं साहित्यकार कवि पंडित आर्य प्रहलाद गिरि ने “आसनसोल ब्रह्मर्षि समाज” के सामाजिक कार्य-कलापों से प्रभावित होकर “भूमिहार ब्राह्मण चालीसा” लिखा। शीघ्र स्वरचित व स्वलिखित इस चालीसा की पांडुलिपि को इस संस्था के अध्यक्ष एवं रानीगंज के सुख्यात समाजसेवी श्री दयाशंकर राय जी को भेंट की। इस अवसर पर भूमिहार ब्राह्मण ब्रह्मर्षि समाज के सचिव कल्याण सिंह, कोषाध्यक्ष सुजीत सिंह, पानागढ़ के उमेश मिश्रा, रवि सिंह, चुन्नू तिवारी, नवलेश सिंह, दुनिया राय, शिवकुमार ठाकुर, मदन ठाकुर, धर्मेंद्र राय आदि दर्जनों पदाधिकारी गण उपस्थित थे! पंडित आर्य गिरि के दमदार आवाज में ही इस “भूमिहार ब्राह्मण चालीसा” का पाठ भी हुआ। जिस पर तालियों के बीच सराहते हुए सभी पदाधिकारियों ने जय परशुराम और भारत माता की जय के भी नारे लगाये। ब्रह्मर्षि समाज के अध्यक्ष दयाशंकर राय ने जहां पंडित आर्य गिरि के इस काव्यात्मक साहित्यिक सेवा की प्रशंसा की, वहीं प्रखर वक्ता व अध्यापक उमेश मिश्रा ने हाजीपुर में आगामी “परशुराम महायज्ञ” के पहले ही इसका मुद्रण एवं संगीत बद्ध गायन पूरा कर लेने की भी इच्छा जताई। विदित हो कि इस भूमिहार ब्राह्मण चालीसा के लेखक पं.आर्य प्रहलाद गिरि इसके पहले भी मां घाघर बूढ़ी चालीसा, योगर्षि रामदेव चालीसा, शनि सत्तरी चालीसा, गो चालीसा आदि भी लिख लिख कर देश धर्म की सेवा के साथ साथ आसनसोल सहित पश्चिम बंगाल का नाम भी पूरे देश में प्रशंसित करते रहे हैं।पंडित आर्य ने बताया कि यह चालीसा भी अपने देशधर्म को संवारने की महती भूमिका निभाने में इसलिए भी सफल रहेगा कि भूमिहार ब्राह्मण समाज के लोग देशधर्मोत्थान में सदा से ही सर्वाधिक तत्पर बने रहे हैं।

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