पत्रकार व नाट्य निर्देशक केशव भट्टड़ की माँ का गोलोकवास

पाठक मंच की हार्दिक श्रद्धांजलि

कोलकाता के हिंदी और राजस्थानी रंगमंच के नाट्य निर्देशक _पत्रकार केशव भट्टड़ की माँ श्रीमती कृष्णा देवी भट्टड़ ने आज सुबह छह बजे अपने बांगुर एवेन्यू स्थित घर पर अंतिम साँस ली। दिवंगत किशनलाल भट्टड़ की धर्मपत्नी कृष्णा देवी का जन्म 15 अप्रैल 1949 को हुआ था। वे अपने पीछे दो पुत्र सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गयी हैं। यह दुखद जानकारी मंच के सक्रिय सदस्य तथा वरिष्ठ पत्रकार शिव सारदा ने दी है।
मित्रों , मां तो मां होती है। जीवन में उसके महत्व को शब्दों में नही बांधा जा सकता। और जब सर से उसका हाथ उठ जाय तो क्या गुजरता है, भुक्तभोगी ही जान सकता है। जैसा कि करीब 52 वर्ष पहले मैंने भुगता था। केशव जी इस समय जिस पीड़ा से गुजर रहे हैं, उसे कहना मुश्किल है। पर सचमुच उन्होंने ऐसी बहादुर मां का दूध पिया है, जो रक्त के रूप में उनकी धमनियों में बह रहा है, जिसका उपयोग केशव ने समाज के ज़रूरतमंदों को 100 से भी अधिक बार रक्त देकर अपने सच्चे सपूत होने का परिचय दिया है। ऐसी मां को हमारा शत – शत नमन व हार्दिक श्रद्धांजलि मेरी तथा पाठक मंच की ओर से भी।
मित्रों, केशव भट्टड पाठक मंच के अति सक्रिय सदस्य हैं तथा कई बार अस्वस्थ होने के बावजूद सभी कार्यक्रम में हमेशा अपना अमूल्य योगदान देते रहे हैं। बहुमुंखी प्रतिभा के धनी केशव, जो कोलकाता- राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद के महासचिव भी हैं तथा पिछले कई दशकों से मेरे परिचित हैं, अपने सामाजिक कार्यों के माध्यम से मां- बाप का नाम रोशन करते रहेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।
केशव मेरे भाई मेरे पास इस समय वे शब्द नहीं है, जो आपको तथा पूरे परिवार को ढ़ाढ़स बंधा सके। हाल ही में नववर्ष पर नये संकल्प के रुप में इसी मंच में आपने लिखा था-देश में सदियां बदल जाती हैं, पर साल नहीं। हमारे देश में अधिकांश के यहां आता ही नहीं “- काश आपकी बात सच हो जाती। न नया साल आता और न आती 11 जनवरी की मनहूस सुबह। काल वहीं ठहर जाता पर ऐसा नहीं हुआ और न कभी होगा। इस काल का ग्रास हम सभी को होना है। यह शाश्वत सत्य जानते हुए भी हम क्यों जियें, वह भी उसी लेख में आपके शब्दों में- ” मौत का एक दिन मुअय्यन है, तो क्या रात भर करवटें बदलते रहें, सोयें नहीं। तो संकल्प करो खुशगवार सुबह लाने का, क्योंकि अब भी फूल खिल रहे हैं, बच्चे खेल रहे हैं, उनके सुहाने भविष्य के लिए, जीवन के लिए ……. नया साल लाना ही है। यही शुकून है।”
अंत में मां को पुनः प्रणाम करते हुए इतना ही कह सकता हूं-
हे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी
हे नाथ नारायण वासुदेवा

-सीताराम अग्रवाल
वरिष्ठ पत्रकार व
संस्थापक- पाठक मंच (कोलकाता)
11 जनवरी 2026

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