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शर्तों में बंधकर साहित्य सृजन संभव नहीं होता, अगर ऐसा होता है तो वो साहित्य की श्रेणी में नहीं विज्ञापन के समकक्ष होता है - डॉ.उमाकांत गुप्त - Kolkata Saransh News

शर्तों में बंधकर साहित्य सृजन संभव नहीं होता, अगर ऐसा होता है तो वो साहित्य की श्रेणी में नहीं विज्ञापन के समकक्ष होता है – डॉ.उमाकांत गुप्त

राजाराम स्वर्णकार की दो पुस्तकों पर चर्चा

बीकानेर 5 मई। अखिल भारतीय साहित्य परिषद की बीकानेर इकाई द्वारा पाठक पर्व मासिक श्रृंखला के अंतर्गत कवि – कथाकार राजाराम स्वर्णकार की दो पुस्तकों पर चर्चा स्थानीय नागरी भंडार स्थित महारानी सुदर्शना कला दीर्घा में आयोजित की गई। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शिक्षाविद-आलोचक साहित्यकार डॉ. उमाकांत गुप्त एवं विशिष्ट अतिथि डॉ. विमला डुकवाल थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉक्टर अखिलानन्द पाठक ने की। इस आयोजन में राजाराम स्वर्णकार के कविता संग्रह तीसरी आंख का सच की समीक्षा हास्य व्यंग्य कवि बाबूलाल छंगाणी बमचकरी और कहानी संग्रह बिंध गया सो मोती की समीक्षा शिक्षाविद-साहित्यकार डॉक्टर मूलचंद बोहरा ने की। मंचीय उद्बोधन देते हुए डॉ. विमला डुकवाल ने कहा साहित्य समाज के लिए आवश्यक होता है जो पीढी को गढ सकता है। मुख्य अतिथि डॉ. उमाकांत गुप्त ने कहा कि साहित्य समाज को शिक्षित और परिष्कृत करने का तत्व है। किसी शर्तों में बंधकर साहित्य सृजन संभव नहीं होता, अगर ऐसा होता है तो वो साहित्य की श्रेणी में नहीं विज्ञापन के समकक्ष होता है। साहित्य में रचने वाले के मौलिक विचार से ही वो मौलिक साहित्य की श्रेणी में आएगा अन्यथा वो मांग पर तैयार प्रोडेक्ट से अधिक कुछ नहीं, इससे प्रत्येक साहित्यकार को बचना अति आवश्यक है। ये काम स्वर्णकार की लेखनी में स्पष्ट झलकता है।
अध्यक्षता करते हुए डॉ. अखिलानंद पाठक ने कहा कि साहित्य का कार्य समाज में समरसता, समन्वय एवं संवेदना स्थापित करना है, राजाराम स्वर्णकार की कहानियों में समाज और परिवार को जोड़ने का संदेश दिया गया है। भारतीय संस्कारों को प्रतिस्थापित करने वाली कहानी नेह की सरिता के माध्यम से जात -पांत को हटाकर प्रेम स्नेह और संवेदना को स्थापित किया गया है। समाज का समग्र विकास तभी होगा जब हम मूल्यपरक, संस्कारपरक शिक्षा कहानियों के माध्यम से नई पीढ़ी में पहुंचाएंगे, राजाराम जी ने यह कामअपने साहित्य में बखूबी किया है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में कवयित्री गायिका डॉ. ज्योति वधवा रंजना ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। कहानी संग्रह बिंध गया सो मोती की समीक्षा करते हुए डॉक्टर मूलचंद बोहरा ने कहा कि बिंध गया सो मोती की कहानियाँ संवेदना, व्यंजना तथा कल्पना की त्रिवेणी से पूरी तरह आप्लावित है। इन कहानियों में दुनिया को श्वेत श्याम की जगह ग्रे रूप में वर्णित किया गया है। ये कहानियां मनोविज्ञान और समाजविज्ञान के नए विमर्श की मांग करती है। कविता संग्रह तीसरी आंख का सच की समीक्षा में बाबूलाल छंगाणी ने कहा कि यह पुस्तक वो च्वनप्राश है जो विभिन्न काव्य विधाओं को मिला कर बना है जो पाठक को तरोताजा रखने में सहायक है।
पुस्तक चर्चा में अपनी बात रखते हुए लेखक कवि-कथाकार राजाराम स्वर्णकार ने कहा कि मैंने यथार्थ में जो अनुभूत किया, जिस जीवन शैली को नजदीक से देखा, मेरे आस-पास के वातावरण में जो घटित हुआ उस कथानक को मैंने अपनी कविताओं एवं कहानियों में सहज और सरल शब्दों में ढालने का प्रयास किया है। राजाराम स्वर्णकार की पुस्तकों की चर्चा में सहभागिता करते हुए वास्तु मार्तंड के के शर्मा ने कहा कि राजाराम स्वर्णकार द्वारा रचित कहानी संग्रह की कहानियों का कथानक बहुत ही कसावट लिए हुए है, उसके नारी पात्र जीवन की विभिन्न विकट स्थितियों का सामना कर रहे हैं, यह परिस्थितियां चाहे पारिवारिक संबंधों की विषमता की हों या आर्थिक तंगी की हों लेकिन उन्होंने संस्कारों को नहीं छोड़ा मजबूरी में भी चरित्र को धूमिल नहीं होने दिया। यह कहानी संग्रह वर्तमान परिपेक्ष्य में एक उत्कृष्ट मार्ग दर्शक के रूप में उभर कर सामने आया है।
व्यंग्यकार, लेखक-संपादक प्रोफेसर अजय जोशी ने कहा कि राजाराम स्वर्णकार आमजन की पीड़ा और भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाले साहित्यकार हैं। इनकी भाषा सरल सहज और संप्रेषणीय है। अपनी बात रखते हुए शिक्षाविद साहित्यकार राजेंद्र जोशी ने कहा कि राजाराम स्वर्णकार समाज और परिवेश में जो देखते हैं उसके आधार पर ही अपनी रचनाओं का ताना बाना बुनते हैं और प्रस्तुत करते हैं। इस अवसर पर एन डी टीवी के ब्यूरो चीफ डॉक्टर नासिर जैदी ने कहा कि राजाराम स्वर्णकार के सृजन की एक विशिष्ट शैली है जिससे उनकी एक अलग पहचान बनी है। गंगानगर से आए साहित्यकार विशाल भारद्वाज ने भी राजाराम स्वर्णकार के रचनाकर्म पर अपनी बात रखते हुए कहा कि बिंध गया सो मोती कहानी संग्रह की कहानियों को पढ़कर जो सबसे प्रथम मेरे हृदय में भाव प्रस्फुटित हुए उस पर जरा गौर फरमाए -अक्षर क्या है / एक आस है / रीते हृदयों की प्यास है / अक्षर से शब्द बनते / शब्द मोती में ढलते / कभी खुशी तो कभी आंसू बन भ निकलते। कहानी संग्रह की कथाएं हमारे ही आस पास के परिवेश की घटनाओं की जो वास्तविक जिंदगी के ताने-बाने से अभिप्रेरित हैं मन को प्रभावित करती है। कार्यक्रम में कवयित्री कथाकार मोनिका गौड़ ने कहा कि पुस्तक चर्चा कार्यक्रम किसी लेखक की सृजनात्मक क्षमता के विविध आयामों को व्यक्त करने का प्रभावी माध्यम है। कार्यक्रम में इसरार हसन कादरी, डॉ.नमामीशंकर आचार्य, डॉ. गौरीशंकर प्रजापत, प्रेमनारायण व्यास, बी. एल. नवीन, डॉ.कृष्णा आचार्य, जुगलकिशोर पुरोहित, जितेन्द्रसिंह राठौड़, एन डी रंगा, गिरिराज पारीक, कासिम बीकानेरी, आत्माराम भाटी, गोपाल व्यास, विप्लव व्यास, इंदरसिंह राजपुरोहित, कमल रंगा, पृथ्वीराज रतनू, रवि पुरोहित, डॉ.फारुख चौहान, संजय पुरोहित, जुगलकिशोर पुरोहित, योगेंद्र पुरोहित विपिनचन्द् सहित अनेक साहित्यकार और गणमान्यजन उपस्थित थे ।
कार्यक्रम का शानदार संचालन मोनिका गौड़ ने किया।साहित्य परिषद बीकानेर इकाई द्वारा आभार ज्ञापन डॉ. अखिलानंद पाठक ने किया।

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