
दुर्गापुर। पश्चिम बर्धमान जिले के दुर्गापुर के कांकसा ब्लॉक के बनकाटी ग्राम पंचायत अंतर्गत अयोध्या गांव में स्थित सैकड़ों वर्ष पुराना पीतल का रथ आज भी अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक और कलात्मक विशेषताओं के कारण लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। बंगाल के प्राचीन रथों में शामिल इस विशालकाय रथ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अद्भुत पीतल की नक्काशी है, जिसमें भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाओं और चारों युगों की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यही कारण है कि यह रथ केवल धार्मिक महत्व ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का भी अनमोल प्रतीक माना जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, अयोध्या गांव में कभी मुखर्जी परिवार का काफी समृद्ध और प्रतिष्ठित निवास था। इसी परिवार ने गांव में रथयात्रा की परंपरा की शुरुआत की थी। बाद में वैवाहिक संबंधों के माध्यम से राय परिवार भी इस धार्मिक आयोजन से जुड़ गया। बताया जाता है कि उस समय मुखर्जी परिवार का लक्खा धातु का व्यापार बीरभूम जिले के इलामबाजार क्षेत्र में होता था। व्यापार से एक दिन प्राप्त संपूर्ण लाभ को भगवान जगन्नाथ की सेवा में समर्पित करते हुए इस भव्य पीतल के रथ का निर्माण कराया गया। तभी से भगवान जगन्नाथ इसी रथ पर विराजमान होकर प्रतिवर्ष मौसीबाड़ी की यात्रा करते हैं।
इस रथ की कलात्मकता इसे अन्य रथों से अलग पहचान दिलाती है। रथ के चारों ओर पीतल पर अत्यंत बारीकी से अनेक पौराणिक एवं ऐतिहासिक दृश्य उकेरे गए हैं। इनमें समुद्र मंथन, भगवान श्रीराम और रावण के युद्ध, विभिन्न धार्मिक प्रसंगों के साथ-साथ चारों युगों से जुड़े चित्र अंकित हैं। इसके अलावा बंगला के प्रसिद्ध ‘सहज पाठ’ से प्रेरित चित्र, तत्कालीन सामाजिक जीवन के दृश्य तथा जिम्नास्टिक और शारीरिक व्यायाम से संबंधित आकृतियां भी रथ पर उकेरी गई हैं। इन कलाकृतियों से उस समय के शिल्पकारों की अद्भुत कला और कल्पनाशीलता का परिचय मिलता है।
स्थानीय इतिहासकारों और बुजुर्गों का कहना है कि इस रथ का निर्माण नवरत्न मंदिर की स्थापत्य शैली से प्रेरित होकर कराया गया था। हालांकि इसका निर्माण किस शिल्पकार ने किया और इसका सटीक निर्माण काल क्या है, इसका कोई प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता आज भी बरकरार है।
अयोध्या गांव अपने प्राचीन मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है, लेकिन यहां की रथयात्रा सबसे बड़ा आकर्षण मानी जाती है। प्रत्येक वर्ष रथयात्रा और उल्टा रथ (बहुदा यात्रा) के अवसर पर यहां विशाल धार्मिक मेले का आयोजन होता है। कांकसा ही नहीं, बल्कि पश्चिम बर्धमान, बीरभूम और आसपास के कई क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस ऐतिहासिक रथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से सुरक्षा के व्यापक इंतजाम भी किए जाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि रथयात्रा की अपेक्षा उल्टा रथ के दिन यहां अधिक उत्साह और उल्लास देखने को मिलता है। पूरे गांव में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं तथा श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है।
उत्सव समाप्त होने के बाद इस ऐतिहासिक पीतल के रथ को मुखर्जी परिवार के पुराने आवास परिसर में सुरक्षित रखा जाता है। कभी राजमहल जैसी भव्यता से सुसज्जित यह विशाल भवन आज जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है, लेकिन उसके आंगन में सुरक्षित रखा गया यह प्राचीन रथ आज भी अतीत की गौरवशाली परंपरा, धार्मिक आस्था और बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का सजीव प्रमाण बना हुआ है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण और संवर्धन किया जाना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें।
