हिंदी पत्रकारिता के द्विशताब्दी वर्ष पर राष्ट्रीय संगोष्ठी : स्वाधीनता आंदोलन से जनजागरण तक हिंदी पत्रकारिता की गौरवगाथा का हुआ स्मरण

समर्पण ट्रस्ट ने वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेवर को ‘पंडित युगल किशोर शुकुल समर्पण पत्रकारिता शिरोमणि सम्मान’ से किया सम्मानित, विद्वानों ने कोलकाता को बताया हिंदी पत्रकारिता की जन्मभूमि

कोलकाता: हिंदी पत्रकारिता के प्रथम समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन के 200 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में समर्पण ट्रस्ट, कोलकाता द्वारा महानगर के रोटरी सदन में “स्वाधीनता आंदोलन में हिंदी समाचार पत्रों की भूमिका” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ गणेश वंदना एवं वंदे मातरम् के सामूहिक गायन से हुआ। इस अवसर पर हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेवर को ‘पंडित युगल किशोर शुकुल समर्पण पत्रकारिता शिरोमणि सम्मान’ प्रदान किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वानों, पत्रकारों, शोधार्थियों एवं बुद्धिजीवियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री आर.एन.रवि. कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके, किंतु उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के द्विशताब्दी वर्ष पर अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए पत्रकारिता के लोकतांत्रिक महत्व को रेखांकित किया।

समर्पण ट्रस्ट के उपाध्यक्ष अभिषेक डोकानिया ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि हिंदी पत्रकारिता का यह ऐतिहासिक और गौरवशाली क्षण है। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता की जन्मभूमि कोलकाता रही है तथा ‘उदन्त मार्तण्ड’ केवल एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि भारतीय बहुभाषिकता, सांस्कृतिक अस्मिता, लोककल्याण, सत्यनिष्ठा और मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इसकी परंपरा ने समाज में निष्पक्षता और जनचेतना का संचार किया है।

मुख्य अतिथि प्रो. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के वर्तमान को समझने के लिए उसके अतीत को जानना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उदन्त मार्तण्ड को प्रकाश में लाने और उसके इतिहास को सुरक्षित रखने में बंगाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने बताया कि बंगाल ने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को अपनी कोख में सुरक्षित रखा और आज भी अनेक ऐतिहासिक सूत्रों की खोज का कार्य जारी है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल घटनाओं का दस्तावेज नहीं, बल्कि समय और समाज को समझने का माध्यम भी है।

अदिति महाविद्यालय, दिल्ली की प्राचार्या डॉ. नीलम राठी ने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य राष्ट्रहित में निष्पक्षता बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पर्याय हैं तथा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता ने जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रो. राजश्री शुक्ला ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पत्रकारिता ने समाज में साहित्य और संस्कार दोनों के पोषण का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि विदेशी साहित्य से प्रेरणा लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवन-मूल्यों और सामाजिक गरिमा को दृष्टि प्रदान करना भी पत्रकारिता का दायित्व है। स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता का योगदान ऐतिहासिक रहा है और आज भी जनजीवन के निर्माण में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् प्रो. राममोहन पाठक ने कहा कि उदन्त मार्तण्ड अपने समय का समग्र समाचार पत्र था, जिसमें समाज, राजनीति और जनजीवन से जुड़े विविध विषयों का समावेश होता था। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि विचार निर्माण की प्रक्रिया भी है। उदन्त मार्तण्ड की सबसे बड़ी विशेषता उसकी जनसरोकारों से जुड़ी दृष्टि थी।

सम्मान प्राप्त करने के बाद वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेवर ने कहा कि पत्रकारिता का कार्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना भी है। उन्होंने आपातकाल के दौर को याद करते हुए कहा कि उस समय पत्रकारों ने अनेक चुनौतियों का सामना किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का वास्तविक दायित्व निराशा के बीच आशा की खोज करना तथा परिवर्तन की दिशा में समाज का मार्गदर्शन करना है।

प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने कहा कि भाषा संस्कृति की वाहक होती है और हिंदी पत्रकारिता के विकास में बंगाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने समर्पण ट्रस्ट के ट्रस्टी प्रदीप ढेडिया को हिंदी एवं भाषा सेवा के क्षेत्र में समर्पित व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि पत्रकारिता ने भारत की विविध भाषाओं और संस्कृतियों को एक-दूसरे के निकट लाने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता ने जनता में वैज्ञानिक सोच और राष्ट्रीय चेतना के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पत्रकार श्री लोकनाथ तिवारी ने कहा कि बंगाल से ही हिंदी पत्रकारिता की प्रारंभिक धारा विकसित हुई। उन्होंने ‘वर्तमान’ समाचार पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि शुरुआती पत्रकारिता का उद्देश्य जन-सूचना और जन-चेतना का विस्तार था। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता को जनहित और सामाजिक उत्तरदायित्व के मूल्यों को पुनः केंद्र में लाने की आवश्यकता है।

वरिष्ठ पत्रकार रविशंकर सिंह ने कहा कि बंगाल हिंदी और बांग्ला भाषाई संस्कृतियों का सेतु रहा है। उन्होंने कहा कि हिंदी समाचार पत्रों ने स्वाधीनता आंदोलन की वैचारिक नींव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के प्रो. सुनील द्विवेदी ने कहा कि प्रत्येक समाचार पत्र का अपना एक दृष्टिकोण और उद्देश्य होता है, जो उसके विचार और कार्यशैली में स्पष्ट दिखाई देता है। वहीं पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रो. किंशुक पाठक ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा करते हुए कहा कि नई तकनीकें पत्रकारिता और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला रही हैं, किंतु मानव मस्तिष्क की सृजनात्मकता और संवेदनशीलता का कोई विकल्प नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि उदन्त मार्तण्ड में नैतिक मूल्यों से जुड़ी खबरों को विशेष महत्व दिया जाता था।

संगोष्ठी के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार एवं कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष स्नेहाशीष सुर ने की। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत कोलकाता से हुई और यह शहर भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में विशेष स्थान रखता है। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में भी प्रिंट मीडिया की प्रासंगिकता बनी हुई है और पत्रकारिता के मूल मूल्य आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

संगोष्ठी में कई गणमान्य व्यक्तित्व एवं समाजसेवी सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, शिक्षाविद्, शोधार्थी, साहित्यकार एवं विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि हिंदी पत्रकारिता का दो सौ वर्षों का इतिहास केवल पत्रकारिता का इतिहास नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता संघर्ष, भाषाई एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की सशक्त गाथा है।

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