धर्म सुधार और स्थिर पंचांग की पहल लेकर काशी से लौटे पं. आर्य प्रहलाद गिरि

अस्सी घाट पर शंखनाद के साथ धार्मिक सुधार अभियान का आगाज, हर पर्व की तिथि सौर पंचांग के अनुसार निर्धारित करने की उठाई मांग

जामुड़िया। हिंदू धर्म में प्रचलित धार्मिक परंपराओं, पर्व-त्योहारों की तिथियों और पंचांग व्यवस्था में सुधार की पहल को लेकर जामुड़िया के निंगा स्थित निंगेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित आर्य प्रहलाद गिरि काशी और अयोध्या की यात्रा से लौट आए हैं। उन्होंने अपनी इस यात्रा के दौरान काशी और अयोध्या के विद्वानों एवं धर्माचार्यों के समक्ष धर्म सुधार और स्थिर पंचांग की आवश्यकता से संबंधित ज्ञापन प्रस्तुत किया। पं. गिरि ने कहा कि धार्मिक परंपराओं में समयानुकूल सुधार और समाज को आडंबरों से मुक्त करने के लिए अब ठोस पहल की जरूरत है। उन्होंने बताया कि धार्मिक सुधार के उद्देश्य से काशी के अस्सी घाट पर धर्मप्रेमियों की उपस्थिति में शंखनाद कर एक अभियान की शुरुआत की गई। इस अभियान को उन्होंने धार्मिक क्रांति और धर्म सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य हिंदू धर्म की मूल भावना को मजबूत करना, धार्मिक परंपराओं को अधिक व्यवस्थित बनाना और समाज में व्याप्त कथित पाखंडों के विरुद्ध जनजागरण करना है।पं. आर्य प्रहलाद गिरि ने कहा कि पर्व-त्योहारों की तिथियों को लेकर अलग-अलग पंचांगों में होने वाली विसंगतियों के समाधान के लिए स्थिर पंचांग की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने सभी प्रमुख पर्वों को सौर पंचांग यानी प्रचलित अंग्रेजी कैलेंडर की निश्चित तिथियों के अनुसार मनाने का प्रस्ताव रखा। उनका मानना है कि इससे पर्व-त्योहारों की तिथियों को लेकर उत्पन्न होने वाली असमंजस की स्थिति दूर करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि धार्मिक सुधार के लिए केवल विद्वानों और धर्माचार्यों की चर्चा पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के जागरूक लोगों को भी आगे आना होगा। पं. गिरि के अनुसार, परंपराओं के नाम पर प्रचलित कुरीतियों और आडंबरों की समीक्षा करते हुए हिंदू धर्म के मानवीय मूल्यों को व्यापक स्तर पर स्थापित करने की आवश्यकता है। पं. गिरि ने अपने अभियान के तहत ‘पाखंड मिटाओ, धर्म बचाओ’ का नारा देते हुए धर्म सुधार के चौदह सूत्रों की चर्चा की। उन्होंने विश्वास जताया कि इन सूत्रों के माध्यम से हिंदू धर्म की मूल भावना, सामाजिक समरसता और मानवीय आदर्शों को अधिक मजबूती प्रदान की जा सकती है। उनके अनुसार, धर्म का उद्देश्य मानवता, सदाचार और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना होना चाहिए। इस अभियान में आसनसोल से गए डॉ. संजीव पांडेय, कन्हैया राम, राजेंद्र पांडेय, मिथिलेश चौहान और रंजय सिंह सहित कई लोग शामिल रहे। पं. गिरि ने बताया कि काशी में उपस्थित धर्मप्रेमियों के बीच शंखनाद के साथ अभियान का सूत्रपात किया गया। उन्होंने धर्माचार्यों से आग्रह किया कि वे बदलते समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए धार्मिक व्यवस्थाओं पर गंभीरता से विचार करें। यात्रा के दूसरे दिन काशी में डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के अवसर पर पं. गिरि ने कैलाश मानसरोवर को हिंदुओं के प्राचीन और महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में स्मरण किया। इसी अवसर पर डॉ. संजीव पांडेय के हाथों उन्होंने अपने नमक-त्याग व्रत का अर्ध-समापन किया। उन्होंने इसे अपनी धार्मिक एवं वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग बताया। काशी यात्रा के बाद आसनसोल से गया दल अयोध्या भी पहुंचा। वहां सरयू नदी के सुरम्य तट पर स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दर्शन का अवसर मिलने पर सभी सदस्य भावविभोर हुए। पं. गिरि के अनुसार, अयोध्या की यात्रा ने दल के सदस्यों को आध्यात्मिक संतोष प्रदान किया। उन्होंने कहा कि धर्म सुधार का उद्देश्य किसी की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि धर्म की मूल भावना को समझते हुए उसे समाज के लिए अधिक उपयोगी बनाना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि पंचांग सुधार, धार्मिक परंपराओं में एकरूपता और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध शुरू किया गया यह अभियान आगे भी जारी रहेगा।

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