
आसनसोल (सत्यनारायण सिंह) । पश्चिम बंगाल विधानसभा में बजट पर हुई चर्चा के दौरान पांडवेश्वर के विधायक जितेंद्र तिवारी ने राज्य की भाषाई एकता और सांस्कृतिक समरसता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे को सदन में उठाया। उन्होंने राज्य के सभी हिंदी माध्यम विद्यालयों में बंगला भाषा को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करने की मांग करते हुए कहा कि बंगाल में रहने वाले प्रत्येक छात्र को राज्य की भाषा, संस्कृति और परंपराओं से परिचित होना चाहिए। विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान तिवारी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में हिंदी और बंगला भाषा के नाम पर समाज में विभाजन पैदा करने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि भाषा कभी भी लोगों को बांटने का माध्यम नहीं हो सकती, बल्कि यह समाज को जोड़ने और आपसी समझ को मजबूत करने का सशक्त साधन है। ऐसे समय में आवश्यक है कि नई पीढ़ी को भाषाई सौहार्द और सांस्कृतिक समन्वय का संदेश दिया जाए।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में विद्यार्थी हिंदी माध्यम विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करते हैं। यद्यपि उनकी पढ़ाई का माध्यम हिंदी है, फिर भी राज्य की प्रमुख भाषा बंगला का ज्ञान उनके लिए अत्यंत आवश्यक है। बंगला भाषा सीखने से छात्र न केवल स्थानीय समाज और संस्कृति को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे, बल्कि राज्य के साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से भी उनका जुड़ाव मजबूत होगा। विधायक ने वित्त मंत्री से अनुरोध किया कि आगामी बजट में ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे सभी हिंदी माध्यम विद्यालयों में बंगला भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि इस पहल को सफल बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में योग्य एवं प्रशिक्षित बंगला शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि आवश्यक शिक्षकों की व्यवस्था नहीं होगी तो इस योजना का अपेक्षित लाभ विद्यार्थियों तक नहीं पहुंच पाएगा। जीतेन्द्र तिवारी ने कहा कि बंगाल की संस्कृति विविधताओं को समेटने वाली संस्कृति है, जहां विभिन्न भाषाओं और समुदायों के लोग वर्षों से एक साथ रहते आए हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को बंगला भाषा का ज्ञान देना केवल शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण कदम होगा। इससे विभिन्न भाषाई समुदायों के बीच संवाद बढ़ेगा और सामाजिक सद्भाव को नई मजबूती मिलेगी। उन्होंने कहा कि राज्य की नई पीढ़ी को बंगाल की गौरवशाली परंपराओं, साहित्यिक धरोहर और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने के लिए यह पहल अत्यंत प्रभावी साबित हो सकती है। साथ ही यह कदम भाषा के आधार पर होने वाली राजनीति को कमजोर कर समाज में एकता और भाईचारे की भावना को मजबूत करने में भी सहायक होगा। विधानसभा में उठाए गए इस प्रस्ताव को शिक्षा और सांस्कृतिक समावेशिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में भी इस मांग को लेकर चर्चा शुरू हो गई है तथा इसे राज्य में भाषाई सौहार्द को बढ़ावा देने वाले सुझाव के रूप में देखा जा रहा है।
