
आसनसोल। आदिवासी धर्म कोड की पुनर्बहाली की मांग को लेकर रविवार को आसनसोल स्थित भारती भवन में एक विशाल सर्व आदिवासी महासम्मेलन का आयोजन किया गया। ऑल आदिवासी को-ऑर्डिनेशन कमेटी (आसनसोल-दुर्गापुर) के तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों से आए आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं समाज के विशिष्ट लोगों ने भाग लिया। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य आदिवासी धर्म कोड को पुनः मान्यता दिलाने की मांग को मजबूत करना तथा आदिवासी समाज की सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक पहचान के संरक्षण को लेकर व्यापक चर्चा करना था। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 1931 तक भारत की जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की व्यवस्था थी, लेकिन बाद में इस व्यवस्था को समाप्त कर दिए जाने से आदिवासी समाज की अलग पहचान प्रभावित हुई है। वक्ताओं का कहना था कि अलग धर्म कोड नहीं होने के कारण आदिवासी समाज के लोग विभिन्न धर्मों की श्रेणियों में दर्ज किए जा रहे हैं, जिससे उनकी वास्तविक जनसंख्या का सही आकलन नहीं हो पा रहा है। इसके परिणामस्वरूप आदिवासियों की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक आस्था और सामाजिक पहचान धीरे-धीरे संकट के दौर से गुजर रही है। सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय आदिवासी समन्वय समिति के अध्यक्ष देव कुमार धान ने कहा कि आदिवासी समाज के अस्तित्व, परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए पूरे समाज को एकजुट होकर आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि विभिन्न आदिवासी समुदायों के लिए अलग-अलग धर्म कोड की मांग व्यावहारिक नहीं है। एक समान और एकीकृत आदिवासी धर्म कोड ही समाज की एकता, पहचान और अधिकारों की रक्षा का मजबूत आधार बन सकता है।उन्होंने कहा कि आगामी जनगणना के दौरान देशभर के सभी आदिवासी समुदायों से यह अपील की जाएगी कि वे अपनी धार्मिक पहचान के रूप में आदिवासी धर्म कोड का उल्लेख करें। उनका मानना है कि इससे आदिवासी समाज की वास्तविक जनसंख्या और उनकी स्वतंत्र पहचान सरकारी अभिलेखों में स्पष्ट रूप से दर्ज हो सकेगी, जिससे भविष्य में उनके अधिकारों और हितों की रक्षा को भी मजबूती मिलेगी।महासम्मेलन में विभिन्न वक्ताओं ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक विशिष्टता को संरक्षित रखने के लिए संगठित आंदोलन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय की भाषा, संस्कृति, परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं देश की बहुलतावादी विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिन्हें संरक्षित और सम्मानित किया जाना चाहिए। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से मतिलाल सोरेन, मसूदी टुडू, सूर्य सिंह बेसरा सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आए अनेक आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में आदिवासी धर्म कोड की पुनर्बहाली की मांग को लेकर व्यापक जनजागरण अभियान चलाने और लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया। सम्मेलन के अंत में आदिवासी समाज की एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और धार्मिक पहचान को सुदृढ़ बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया गया तथा सरकार से आदिवासी धर्म कोड को पुनः मान्यता देने की मांग की गई।
