
जामुड़िया। जामुड़िया विधानसभा क्षेत्र में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम “अंडर एडजुडिकेशन” श्रेणी में रखे जाने तथा कुछ नामों को सूची से हटाए जाने के विरोध में आज माकपा कार्यकर्ताओं ने बीडीओ कार्यालय के समक्ष जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के बाद पार्टी प्रतिनिधिमंडल ने प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर शीघ्र समाधान की मांग की।
प्रदर्शन के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेताओं ने आरोप लगाया कि जामुड़िया 261 विधानसभा क्षेत्र में 13 हजार से अधिक मतदाताओं के नाम एसआईआर सूची में “अंडर एडजुडिकेशन” तथा डिलीट श्रेणी में डाल दिए गए हैं। उनका कहना था कि संबंधित मतदाताओं ने वर्ष 2002 की मतदाता सूची की प्रति एवं अन्य आवश्यक दस्तावेज नियमानुसार जमा किए थे, इसके बावजूद उनके नाम सत्यापन लंबित श्रेणी में रखे गए हैं। कुछ मामलों में नाम पूरी तरह से सूची से हटाए जाने की बात भी सामने आई है। पार्टी नेताओं ने दावा किया कि चुरुलिया पंचायत सदस्य शाह आलम का नाम भी मतदाता सूची से हटा दिया गया है। इस घटना को उन्होंने गंभीर अनियमितता करार दिया।

जामुड़िया विधानसभा के माकपा सचिव सुमित कवि ने कहा कि इस मुद्दे को लेकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित कराया गया है और प्रभावित मतदाताओं के नामों की पुनः जांच कर उन्हें सूची में पुनः शामिल करने की मांग की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी, मुसलमान और दलित समुदाय के लोगों के नाम अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हुए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। वहीं माकपा नेता मनोज दत्ता ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग से निष्पक्ष एवं पारदर्शी प्रक्रिया की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग पर केंद्र और राज्य सरकारों का प्रभाव दिख रहा है। साथ ही उन्होंने परोक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठाए। प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक मौजूद रहे। नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि प्रभावित मतदाताओं के नामों को लेकर संतोषजनक कार्रवाई नहीं की गई, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से अपना आंदोलन जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि मताधिकार प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है और इसे हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए। वही इस पूरे घटनाक्रम के बाद क्षेत्र में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। अब सभी की नजरें प्रशासन और निर्वाचन अधिकारियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
