
हिन्दी साहित्य परिषद के मंच पर गीत महर्षि श्री संतोष आनंद के गीतों ने मोह लिया सबका मन
हावड़ा। जहाँ एक ओर महाशिवरात्रि की भक्ति की लहर थी और दूसरी ओर भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच का रोमांच, वहीं हावड़ा का ‘शरत सदन’ हिंदी साहित्य की अविरल धारा में सराबोर रहा। हिंदी साहित्य परिषद द्वारा आयोजित भव्य कवि सम्मेलन ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए, जहाँ हजारों की संख्या में उमड़े जनसैलाब ने यह सिद्ध कर दिया कि कविता का स्थान आज भी सर्वोपरि है।। तिनसुकिया असम से पधारे साहित्य प्रेमी श्री मनोज मोदी ने मंच का गठन किया और मंच पर अतिथियों का सम्मान कर आतिथ्य की परंपरा को गौरव प्रदान किया। तदोपरांत उद्योगपति समाजसेवी और संस्था के चेयरमैन श्री तारकनाथ दुबे के स्वागत भाषण से हुआ, जिन्होंने साहित्य के प्रति अपने गहरे अनुराग को साझा किया। हिन्दी साहित्य परिषद के अध्यक्ष संजय शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के संरक्षण पर बल दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ आगरा की डॉ ज्योत्सना शर्मा के सरस्वती वंदना से हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, उत्सव मूर्ति गीत महर्षि श्री संतोष आनंद ने अपनी चिरपरिचित मधुर शैली और कालजयी रचनाओं से श्रोताओं को भावुक कर दिया। “एक प्यार का नगमा है” जैसी रचनाओं के रचयिता ने जब मंच संभाला, तो पूरा सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
काफी देर तक श्रोता खड़े होकर तालियां बजाते रहे। उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल शब्दों का जाल बुना बल्कि संवेदनाओं का एक ऐसा संसार रचा जिसमें हर कोई डूबता चला गया। कार्यक्रम के दूसरे सत्र का संचालन कवि जयकुमार ‘रुसवा’ ने किया। आगरा से आईं वरेण्य कवयित्री डॉ ज्योत्स्ना शर्मा ने अपनी काव्य प्रस्तुति से स्त्री मन की सूक्ष्म भावनाओं को उकेरा, वहीं कोल इंडिया के अधिकारी और कवि ओम प्रकाश मिश्रा के मधुर गीतों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया कार्यकारिणी के आदित्य त्रिपाठी, प्रणति ठाकुर , संजय शुक्ल, कमल अपरिचित, मौसमी प्रसाद, डॉ क्षिप्रा मिश्रा, शकील गोंडवी,विजय इस्सर, रीमा पाण्डेय और देवेश मिश्रा कवियों ने भी काव्य पाठ किया। आर.आई.एस. ग्रुप , सूप्रा पेन मेडियोन डायग्नोस्टिक, फर्स्ट यूनिफार्म और कोल इंडिया लिमिटेड से विज्ञापित एवं आयोजित इस कार्यक्रम को सफल बनाने में परिषद के प्रत्येक सक्रिय सदस्य की मेहनत साफ झलक रही थी। विपरीत परिस्थितियों और बड़े आकर्षणों (मैच एवं पर्व) के बावजूद शरत सदन का खचाखच भरा होना आयोजकों की सबसे बड़ी विजय रही।साहित्य जब समाज को जोड़ता है, तो इतिहास रचा जाता है। हावड़ा की यह शाम शब्दों के उन जादूगरों के नाम रही, जिन्होंने हमें फिर से मनुष्य होना सिखाया
