
रानीगंज। देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की पूजा को लेकर रानीगंज में तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। पूजा में अब महज एक दिन शेष रह गए हैं। ऐसे में बाजारों में चहल-पहल बढ़ने लगी है। शहर के विभिन्न जगहों पर भगवान विश्वकर्मा की आकर्षक प्रतिमाओं की दुकानें सज गई हैं। दूर से ही रंग-बिरंगी प्रतिमाएं लोगों का ध्यान खींच रही हैं और उनकी बिक्री भी शुरू हो गई है। हर वर्ष की तरह इस बार भी यहां बर्द्धमान से आए मूर्तिकारों और विक्रेताओं ने अस्थायी दुकानें लगाई हैं। इन दुकानदारों का रानीगंज से रिश्ता महज कारोबार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। विक्रेताओं के अनुसार, वे पिछले 20 वर्षों से भी अधिक समय से विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर बर्द्धमान से रानीगंज आकर प्रतिमाओं की बिक्री करते हैं। उनका कहना है कि उनके पिता और दादा भी इसी स्थान पर आकर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमाएं बेचा करते थे। इस तरह प्रतिमा निर्माण और बिक्री का यह काम उनके परिवार की पुश्तैनी परंपरा बन चुका है। हालांकि, पूजा की तैयारियां जहां जोर पकड़ रही हैं, वहीं प्रतिमा विक्रेताओं के चेहरे पर बाजार की स्थिति को लेकर कुछ चिंता भी दिखाई दे रही है। दुकानदारों का कहना है कि पिछले वर्षों की तुलना में इस बार अब तक बाजार में अपेक्षित तेजी नहीं आई है। खरीदार दुकान तक पहुंच रहे हैं, लेकिन बिक्री की रफ्तार फिलहाल कुछ धीमी है। विक्रेताओं को उम्मीद है कि पूजा में अभी दो दिन का समय बाकी है और अंतिम समय में प्रतिमाओं की मांग बढ़ सकती है। उनका कहना है कि विश्वकर्मा पूजा से ठीक पहले औद्योगिक प्रतिष्ठानों, कारखानों, गैराजों, वर्कशॉप और विभिन्न व्यावसायिक संस्थानों की ओर से प्रतिमाओं की खरीदारी बढ़ जाती है। ऐसे में आने वाले एक-दो दिनों में बाजार में तेजी आने की उम्मीद है। मूर्तिकारों के सामने बढ़ती लागत भी बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। विक्रेताओं ने बताया कि प्रतिमाओं को बर्द्धमान से रानीगंज तक लाने में परिवहन खर्च लगातार बढ़ रहा है। पहले जहां प्रतिमाओं को लाने के लिए करीब तीन हजार रुपये तक खर्च आता था, वहीं अब इसके लिए लगभग चार हजार रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। परिवहन खर्च में हुई इस बढ़ोतरी का सीधा असर उनके मुनाफे पर पड़ रहा है। विक्रेताओं के मुताबिक प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और अन्य खर्च बढ़ने के बावजूद बाजार में कीमत को बहुत अधिक बढ़ाना संभव नहीं है। इससे लागत और बिक्री मूल्य के बीच अंतर कम रह जाता है और मेहनत के अनुपात में मुनाफा काफी कम हो गया है।मूर्तिकारों ने बताया कि बड़ी आकार की प्रतिमा बेचने पर करीब 100 से 200 रुपये तक का ही लाभ मिल पाता है। वहीं छोटी प्रतिमाओं में यह मुनाफा और भी कम है। छोटी प्रतिमा बेचने पर लगभग 10 से 20 रुपये तक की ही बचत हो रही है। ऐसे में दूर से प्रतिमाएं लाने, दुकान लगाने और कई दिनों तक बिक्री का इंतजार करने के बावजूद वास्तविक कमाई सीमित रह जाती है। इसके बावजूद इन मूर्तिकारों ने इस पारंपरिक व्यवसाय को जारी रखा है। उनके लिए यह केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि भगवान विश्वकर्मा के प्रति आस्था और परिवार की पुरानी परंपरा से जुड़ा कार्य भी है। विश्वकर्मा पूजा औद्योगिक और कामगार क्षेत्रों में विशेष महत्व रखती है। कारखानों, वर्कशॉप, गैराजों तथा विभिन्न प्रतिष्ठानों में मशीनों और औजारों की पूजा के साथ भगवान विश्वकर्मा की आराधना की जाती है। इसी कारण पूजा के नजदीक आते ही प्रतिमाओं की मांग बढ़ने लगती है।
रानीगंज में एनएसबी रोड पर सजी विश्वकर्मा की प्रतिमाएं इस पर्व की दस्तक का अहसास करा रही हैं। एक ओर जहां लोग पूजा की तैयारियों में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर बर्द्धमान से आए मूर्तिकार अंतिम समय में अच्छी बिक्री की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बढ़ती लागत और सीमित मुनाफे के बावजूद वर्षों पुरानी परंपरा को निभाते हुए इन मूर्तिकारों की मेहनत रानीगंज में विश्वकर्मा पूजा की तैयारियों को एक अलग रंग दे रही है।
