लिख दिया है आज फिर उनके लिए
था कभी मैं भी प्रिय जिनके लिए
अब बदलकर रूप वे ठगने लगे हैं
मैं जताऊं प्रीत अब किनके लिए.!!
था कभी गंतव्य अपना एक जैसा
मन को जो भाए वही लगता था वैसा
बंट गए फिर छंट गए वादे इरादे
सहपथिक अब कौन है किसके लिए.!!
पोटली सुख-दुःख की हम भी बांटते थे
दूर से ही देखकर पहचानते थे
पास रहकर दूर अब लगने लगे हैं
रात भर जगता था मैं जिसके लिए.!!
तुम निभाओ तो निभेगी प्रीति ये
हो गई है आजकल की रीति ये
वो भुलाकर चल दिए ऐसे मुझे
फ़िक्र में हरपल रहे जिनके लिए.!!
हर किसी के पास शिकवे और गिले हैं
ज़ख्म अक्सर आज अपनों से मिले हैं
सोचकर कंधेपर रखते हाथ हैं
अब नहीं रोता “विजय” सबके लिए.!!
अब नहीं रोता “विजय” सबके लिए.!!
