
पिछले वर्ष यानि 21 जुलाई 2025 को धर्मतल्ला (कोलकाता ) में आयोजित ममता की विशाल शहीद रैली पर टिप्पणी करते हुए मैंने लिखा था- ” मारा सीपीएम ने, मार खायी कांग्रेस, मना रही है तृणमूल कांग्रेस तथा गालियां खा रही है बीजेपी। ” है न आश्चर्य की बात। पहले इस बात का अर्थ संक्षेप में समझ लें। जिस घटना के सन्दर्भ में शहीद रैली का आयोजन किया जाता है, वह 21 जुलाई 1993 की है। उस समय पश्चिम बंगाल में वाममोंर्चा की सरकार थी। मुख्यमंत्री ज्योति बसु थे। सीपीएम सबसे बड़ा व शक्तिशाली दल होने के कारण इसका दबदबा था। उन दिनों ममता बनर्जी कांग्रेस में थी तथा राज्य युवा कांग्रेस की प्रमुख थी। मतदाता पहचान पत्र की मांग को लेकर ममता के नेतृत्व में राइटर्स बिल्डिंग (तत्कालीन राज्य सचिवालय ) के घेराव का आह्वान किया गया था। सरकार हर हालत में इसे विफल करने पर तुली हुई थी। अत: राइटर्स पहुंचने के सभी रास्तों पर पुलिस का जबर्दस्त इंतजाम था। युवा कांग्रेस द्वारा जबरन पहुंचने के प्रयास को विफल करने के लिए पुलिस ने बलप्रयोग के साथ गोलियां भी चलायी, जिसमें 13 व्यक्तियों ने प्राण गवाये। बताया जाता है कि इस घटना में और एक व्यक्ति मारा गया है, जिसका परिचय ज्ञात नहीं ही पाया।

तब से प्रति वर्ष ममता के नेतृत्व में दिवंगतों की याद में शहीद रैली मनायी जाने लगी। पर ममता ने 1998 में कुछ लोगों को साथ लेकर तृणमूल कांग्रेस नामक अलग पार्टी बना ली। अब अगर देखा जाय तो यह कार्यक्रम तो कांग्रेस का था, तृणमूल से इसका कोई संबंध नहीं होना चाहिये। पर समरथ को नहीं दोष गोसाईं। उन दिनों कांग्रेस की कमजोरी तथा टीएमसी के बढ़ते प्रभाव के कारण 21 जुलाई को शहीद रैली का आयोजन ममता के नाम हो गया। 2011 में सत्ता में आने के बाद यह कार्यक्रम शहीदों को श्रद्धांजलि देने का काम कम तथा शक्ति प्रदर्शन व राजनीतिक एजेंडा ज्यादा हो गया। विरोधियों को पानी पी पी कर कोसने के अलावा जम कर गालियां दी जाने लगी। 2021 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम तथा कांग्रेस का सफाया तथा 77 सीटें जीत कर भाजपा काफी शक्तिशाली हो गयी। बस आलोचना का तीर भाजपा की ओर घूम गया, जबकि शहीद रैली की घटना से बीजेपी का दूर- दूर तक कोई संबंध नहीं है। यहां तक कि ममता पर आरोप है कि 1993 में कथित तौर पर जिस उच्चाधिकारी के आदेश से गोलियां चली थीं, उसे न सिर्फ अपने मंत्रिमंडल में स्थान दिया, बल्कि उसे राज्यसभा में भी भेज दिया। आशा है, अब आप लोग मेरी टिप्पणी का अर्थ समझ गये होंगे।

खैर अब स्थिति बदल चुकी है। राज्य में भाजपा प्रचंड बहुमत से सरकार बना चुकी है तथा किसी जमाने में ममता के करीबी रह चुके के हाथों वे दो बार हार चुकी हैं। राज्य प्रशासन की कमान भी उसी व्यक्ति यानि शुभेन्दु अधिकारी के हाथों में हैं। इधर पराजय के बाद तृणमूल खंड- खंड हो चुकी है। कुछेक को छोड़कर ममता के सभी करीबी उनका साथ छोड़ चुके हैं। जीतने के बाद 80 विधायकों में से करीब 65 ने एकजुट होकर अपने आप को असली तृणमूल होने का दावा ठोक दिया है। राज्य विधानसभा में इस गुट को मान्यता मिल गयी है तथा इस गुट के नेता ॠतब्रत विरोधी दल के नेता बन गये हैं। लोकसभा के 28 में से 20 तृणमूल सांसद एक दूसरी पार्टी में चले गये हैं। राज्यसभा के 3 सांसदो ने टीएमसी से त्यागपत्र देकर भाजपा का दामन थाम लिया है और उन्हें बीजेपी ने राज्यसभा का प्रार्थी भी बना दिया है। टीएमसी का चुनाव चिन्ह व बैंक खाते भी खतरे में हैं। इन परिस्थितियों में ममता यह भलीभांति जानती हैं कि पिछली रैलियों की तरह शहीद रैली का आयोजन अब दिवास्वप्न है। फिर भी इज्जत बचाने के लिए कुछ तो गतिविधि दिखाना जरूरी है। अतः उनकी पार्टी (जिसे अब चलती भाषा में कालीघाट तृणमूल कहा जाता है ) की ओर से पुलिस से धर्मतल्ला में रैली करने की अनुमति मांगी गयी थी, पर मना कर देने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया गया है। उधर दूसरे गुट (जिसे ॠतब्रत गोष्ठी कहा जाता है) ने भी रैली करने की अनुमति मांगी है। ममता की हताशा उनके इस बयान से ही झलकती है कि भले ही उन्हें रिक्शा पर चढ़कर संबोधन करना पड़े, पर रैली करेंगी जरूर। ज्ञातव्य है कि भवानीपुर से चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने कहा था- भले ही एक वोट से जीत हो, पर यह सीट मैं जीतूंगी जरूर। और हुआ क्या, हम सभी जानते हैं। 15 वर्षों तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहने के बावजूद हार गयीं।

मेरे कहने का अर्थ यह कतई नही हैं कि ममता बनर्जी ने अपना सारा करिश्मा खो दिया है। हो सकता है कि जुझारूपन, लड़ाकू स्वभाव, तथा आन्दोलन की जिस राजनीति के बल पर अतीत में उन्होंने जो सफलता हासिल की थी, वह शायद आनेवाले समय में आम जनता का विश्वास कुछ हद तक पा लें, पर अपनों ने जिस तरह से उनका साथ छोड़ा है, उसे देखते हुए फिलहाल ऐसा होना अत्यंत कठिन है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि इस बार किसी भी तरह से 21 जुलाई को शहीद रैली का आयोजन करना ममता की मजबूरी है।

वरिष्ठ पत्रकार सीताराम अग्रवाल
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