हूल दिवस पर संताल विद्रोह के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि, निमचा मे निकाली गई विशाल पदयात्रा निकाल

रानीगंज। हूल दिवस के अवसर पर मंगलवार को रानीगंज के निमचा कोलियरी आदिवासी क्षेत्र में संताल हूल के अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मुरगाथोल पांचपाड़ा के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में आदिवासी महिला-पुरुष, युवा एवं बुजुर्ग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। पूरे क्षेत्र में संताल समाज के वीर शहीदों के प्रति सम्मान, गौरव और ऐतिहासिक चेतना का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। 30 जून का दिन आदिवासी समाज के लिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 1855 में इसी दिन वर्तमान झारखंड के भगनाडीह गांव से ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, जमींदारों, महाजनों और सूदखोरों के शोषण के विरुद्ध सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में ऐतिहासिक संताल हूल (विद्रोह) की शुरुआत हुई थी। इस जनआंदोलन में चांद मुर्मू, भैरव मुर्मू, फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू सहित हजारों आदिवासियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। वर्ष 1855-56 के इस ऐतिहासिक विद्रोह में हजारों संताल वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
इसी गौरवशाली इतिहास को स्मरण करते हुए मंगलवार सुबह से ही निमचा क्षेत्र के विभिन्न गांवों से लोग पारंपरिक परिधानों में मुरगाथोल में एकत्रित होने लगे।प्रतिभागियों के हाथों में संताल संस्कृति के प्रतीक तीर-धनुष थे, जबकि धामसा और मादल की गूंज पूरे वातावरण को ऐतिहासिक संघर्ष की याद दिला रही थी। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन और जोशीले नारों के बीच निकली विशाल पदयात्रा ने पूरे क्षेत्र को उत्साह और श्रद्धा से भर दिया। मुरगाथोल से प्रारंभ हुई यह भव्य पदयात्रा निमचा क्षेत्र के विभिन्न मार्गों से होकर लाल मैदान पहुंची, जहां इसका समापन हुआ। पूरे मार्ग में संताल हूल के अमर शहीदों के सम्मान में नारे लगाए गए। इसके बाद सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू, भैरव मुर्मू, फूलो मुर्मू तथा झानो मुर्मू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। उपस्थित लोगों ने उनके अदम्य साहस, संघर्ष और बलिदान को नमन करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ऑल आदिवासी को-ऑर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष जनार्दन कोड़ा ने कहा कि हूल दिवस कोई उत्सव नहीं, बल्कि अपने वीर पूर्वजों के सर्वोच्च बलिदान को स्मरण करने का दिन है। उन्होंने कहा कि सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा फूलो-झानो ने शोषण और अन्याय के विरुद्ध जो संघर्ष प्रारंभ किया था, वह आज भी समाज को अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को इस गौरवशाली इतिहास से परिचित कराना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। स्थानीय निवासी रामलाल टुडू ने कहा कि 30 जून आदिवासी समाज के लिए गौरव, आत्मपहचान और संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह दिन कभी भुलाया नहीं जा सकता। इसी कारण प्रत्येक वर्ष पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ हूल दिवस मनाया जाता है और आने वाली पीढ़ियों को इस ऐतिहासिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। कार्यक्रम में प्रदीप बाउरी, सूरज प्रसाद, रतन बाउरी, राजू महाली सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में आदिवासी महिला-पुरुषों और युवाओं ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। हूल दिवस का यह आयोजन केवल श्रद्धांजलि सभा या पदयात्रा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संताल समाज के गौरवशाली इतिहास, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के लिए दिए गए बलिदानों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बना। निमचा की धरती पर एक बार फिर यह संदेश गूंज उठा कि अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष करने वालों का बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता और इतिहास सदैव ऐसे वीरों को सम्मान के साथ याद रखता है।

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