रानीगंज में निर्दलीय प्रत्याशी की एंट्री से बदला चुनावी समीकरण: गोपाल आचार्य ने भरा नामांकन, ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ बना मुख्य मुद्दा

रानीगंज। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के आगामी चरणों से पहले रानीगंज विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से पूर्व नामांकन के अंतिम दिन एक अहम और दिलचस्प घटनाक्रम सामने आया, जब क्षेत्र के चर्चित समाजसेवी एवं ‘रानीगंज बचाओ मंच’ के सक्रिय सदस्य गोपाल आचार्य ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल कर चुनावी मुकाबले को नया मोड़ दे दिया। गोपाल आचार्य ने दुर्गापुर स्थित एसडीओ कार्यालय पहुंचकर विधिवत रूप से अपना नामांकन पत्र जमा किया। उनके इस कदम से रानीगंज की चुनावी लड़ाई अब और अधिक रोचक होती नजर आ रही है। स्थानीय निवासी गोपाल आचार्य रानीगंज के शीतला गली, एनएसबी रोड क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और लंबे समय से क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। नामांकन के बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अब तक रानीगंज से चुने गए अधिकांश जनप्रतिनिधि बाहरी क्षेत्रों से रहे हैं, जिनमें स्थानीय मुद्दों और जनभावनाओं से जुड़ाव की कमी रही। उन्होंने इस बार “स्थानीय बनाम बाहरी” के मुद्दे को प्रमुख बनाते हुए चुनाव मैदान में उतरने की बात कही। गौरतलब है कि रानीगंज विधानसभा सीट पर पहले से ही भारतीय जनता पार्टी, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। ऐसे में गोपाल आचार्य की निर्दलीय उम्मीदवारी ने इस मुकाबले को त्रिकोणीय से बहुकोणीय बना दिया है, जिससे चुनावी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।
मीडिया से बातचीत के दौरान गोपाल आचार्य ने कई ज्वलंत मुद्दों को उठाया। उन्होंने क्षेत्र की नदियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे को गंभीर पर्यावरणीय संकट बताते हुए इस पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता जताई। साथ ही रानीगंज को एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बताते हुए उन्होंने व्यापारियों की समस्याओं को विधानसभा तक पहुंचाने और उनके समाधान के लिए संघर्ष करने का वादा किया। उन्होंने विश्वास जताया कि इस बार क्षेत्र की जनता बाहरी उम्मीदवारों के बजाय अपने स्थानीय प्रतिनिधि को प्राथमिकता देगी और उन्हें समर्थन देकर विधानसभा भेजेगी। गोपाल आचार्य की उम्मीदवारी से रानीगंज का चुनावी मुकाबला अब और भी दिलचस्प हो गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच जनता “मिट्टी के लाल” पर कितना भरोसा जताती है।

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