
बक्सर/कोलकाता : मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) देवेश कुमार की अदालत ने मंगलवार को अभियुक्त अशोक कुमार ओझा को भारतीय वन अधिनियम की धारा 9, 39, 42ए, 44, 49बी, 51 और 52 के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया। शिकायत संख्या 94-सी/2024 में ‘उचित संदेह की छाया’ का हवाला देते हुए ओझा को निर्दोष घोषित किया गया। अदालत ने फैसले में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सका, जिससे मामला पक्ष के पक्ष में चला गया।
कोर्ट ने आदेश जारी करते हुए ओझा को तत्काल बरी कर दिया और उनके जमानतदारों को बांड की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। जो स्थानीय वन्यजीव संरक्षण और अवैध कटाई के मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है। सीजेएम देवेश कुमार ने फैसले पर हस्ताक्षर करते हुए जो 1 अप्रैल 2026 को प्रभावी हो गया।
अशोक ओझा के वकील ने इसे न्यायिक जीत करार दिया। उन्होंने बताया कि अभियुक्त पर वन क्षेत्र में कथित अवैध गतिविधियों का आरोप था, लेकिन जांच में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। बक्सर जिले में वन अधिनियम के तहत दर्ज मामले अक्सर विवादास्पद रहते हैं, जहां स्थानीय निवासियों पर सख्ती के आरोप लगते हैं। यह फैसला वन विभाग की जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अशोक ओझा एक सामान्य व्यवसायी और राजनीतिज्ञ हैं, जिन पर राजनीतिक दबाव में झूठा केस ठोंका गया। वन विभाग ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। अशोक ओझा ने फैसले के बाद कहा, “न्याय की जीत हुई है।” यह मामला बिहार के वन क्षेत्रों में कानूनी जटिलताओं को उजागर करता है, जहां धारा 51-52 के तहत सजा कड़ी होती है
