सिलीगुड़ी, 16 मार्च । विधानसभा चुनाव को लेकर वाम मोर्चा ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। कभी वामपंथियों का मजबूत गढ़ रहे सिलीगुड़ी महकमा और आसपास की विधानसभा सीटों में खोई जमीन वापस पाने के लिए इस बार पार्टी ने पुराने और भरोसेमंद चेहरों पर दांव लगाया है।
सिलीगुड़ी सीट पर लगातार 22 साल मंत्री रहे वरिष्ठ नेता अशोक भट्टाचार्य का दौर अब खत्म होने जा रहा है। उम्र के कारण उन्होंने इस बार चुनावी मैदान से खुद को अलग कर लिया है। उनके खाली किए हुए स्थान पर माकपा ने 29 नंबर वार्ड के पार्षद जय चक्रवर्ती को उम्मीदवार बनाया है।
छात्र-युवा आंदोलन से राजनीति में आए जय चक्रवर्ती पार्टी के भीतर शांत स्वभाव और बेहद भरोसेमंद नेता माने जाते है। 2021 की करारी हार के बाद विधानसभा में अपनी मौजूदगी बचाए रखने की जिम्मेदारी अब जय के कंधों पर है।
वहीं, डाबग्राम-फुलबाड़ी सीट पर पार्टी ने अपने पुराने और अनुभवी नेता दिलीप सिंह पर फिर भरोसा जताया है। सिलीगुड़ी नगर निगम के पूर्व चेयरमैन और लंबे समय से सक्रिय संगठनकर्ता दिलीप सिंह पहले भी इस सीट से चुनाव लड़ चुके है।
हालांकि पिछली बार जीत नहीं मिली थी, लेकिन इस बार खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए वामपंथी उनके संगठनात्मक अनुभव को हथियार बना रहे है।
जबकि तराई क्षेत्र की अहम सीट माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी से इस बार पार्टी ने किसान नेता झरेन राय को मैदान में उतारा है। वह सिलीगुड़ी महकमा परिषद के पूर्व सहकारी सभाधिपति भी रह चुके है और प्रशासनिक अनुभव रखते है।
आदिवासी और राजबंशी वोट बैंक में उनकी व्यक्तिगत पकड़ को देखते हुए पार्टी इस सीट पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है।
राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भी लंबे समय तक सिलीगुड़ी मॉडल के सहारे वामपंथियों ने यहां अपनी पकड़ बनाए रखी थी।
लेकिन 2021 के बाद भाजपा के उभार और तृणमूल कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव के कारण पार्टी धीरे-धीरे कमजोर हुई है।
ऐसे में इस बार का चुनाव वाम मोर्चे के लिए सिर्फ सीट जीतने का सवाल नहीं, बल्कि पहाड़ और तराई क्षेत्र के इस महत्वपूर्ण इलाके में अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक मौजूदगी साबित करने की बड़ी चुनौती भी है।
