
कोलकाता, 8 मार्च 2026। राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा आयोजित ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाएँ: आयुर्वेद से अंतरिक्ष तक’ का शुभारंभ डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने शब्दभूमि प्रकाशन का परिचय देते हुए कहा कि यह साहित्य की वह उर्वर भूमि है, जहाँ शब्द केवल लिखे नहीं जाते, बल्कि संवेदना, विचार और समय की चेतना के साथ अंकुरित होते हैं।
उन्होंने बताया कि शब्दभूमि प्रकाशन कोई विशुद्ध व्यावसायिक प्रकाशन गृह नहीं, बल्कि लेखकों का अपना सहकारी मंच है, जिसका उद्देश्य साहित्य का संवर्धन, संरक्षण और प्रसार है। यह मंच कविता, कहानी, आलोचना, संस्मरण, शोध तथा वैचारिक लेखन जैसी विविध विधाओं को प्रोत्साहित करता है और नए तथा स्थापित दोनों प्रकार के रचनाकारों को गरिमा और गुणवत्ता के साथ अपनी रचनाएँ पाठकों तक पहुँचाने का अवसर देता है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि शब्दभूमि प्रकाशन हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं की समृद्ध परंपरा को भी महत्व देता है और अनुभवी संपादकीय व डिज़ाइन टीम के सहयोग से पुस्तक निर्माण के साथ-साथ साहित्यिक गोष्ठियों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से साहित्यिक संवाद को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है।

इस संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं के ऐतिहासिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक और सामाजिक योगदान को पुनः रेखांकित करना तथा समकालीन परिप्रेक्ष्य में उनके महत्व को समझना था।
कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आभासीय पटल पर जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों और लेखकों ने भाग लेकर भारतीय परंपरा में स्त्री-ज्ञान की विविध धाराओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
संगोष्ठी के अंतर्गत 34 प्रमुख विषयों को केंद्र में रखते हुए विमर्श आयोजित किया गया, जिनमें वैदिक ऋषिकाओं के दार्शनिक योगदान, ब्रह्मवादिनी स्त्रियों की ज्ञान-दृष्टि, उपनिषदों में स्त्री-विमर्श, बौद्ध और जैन परंपरा में भिक्षुणियों की बौद्धिक भूमिका, आयुर्वेद और लोक-चिकित्सा में महिलाओं की परंपरा, धात्री-विद्या, चरक-सुश्रुत परंपरा में स्त्री स्वास्थ्य विमर्श जैसे विषय प्रमुख रहे।
इसके अतिरिक्त संगोष्ठी में भक्ति आंदोलन में स्त्री-स्वर, महिला लेखिकाओं की राष्ट्रवादी चेतना, भारतीय भाषाओं में स्त्री आत्मकथा, STEM क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका, भारतीय महिला वैज्ञानिकों का अंतरिक्ष विज्ञान में योगदान तथा कल्पना चावला से चंद्रयान तक भारतीय महिलाओं के अंतरिक्ष स्वप्न जैसे समकालीन विषयों पर भी महत्वपूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किए गए।
इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से आभासीय पटल पर जुड़े विद्वानों अधिवक्ता अंजू मनोत (कोलकाता), बी. मल्लिका (तमिलनाडु), डॉ. रुचि पालीवाल (उदयपुर), डॉ. रेखा भालेराव (उज्जैन), डॉ. कुसुम दीक्षित चौहान (भोपाल), अंजना त्रिपाठी (वाराणसी), डॉ. मंदा माणिकराव नांदुरकर (अमरावती), रुपाली अरुणराव हिवसे (नागपुर), शांति सोनी (बिलासपुर), अंजू पाण्डेय (मुंबई), डॉ. सपना चंदेल (शिमला), डॉ. अनिता कुमारी (जमशेदपुर), अनिता मोदी (बेंगलुरु), डॉ. कृष्णा कुमारी आर्या (महेंद्रगढ़), सुचित्रा शरदभाई कुलकर्णी (अहिल्यानगर), डॉ. सीमा रानी (झज्जर), माधुरी करसाल (बिलासपुर), प्रियंका सिंह (मुंबई), रीमा डी. राखसीया (राजकोट), काजल कुमारी (पटना), कुमारी रीता (लखनऊ), डॉ. छाया शंकर माली (कोल्हापुर), डॉ. शोभा डी, डॉ. वासंथी जी, डॉ. गीतिका सूद और डॉ. संगीता कुमारी ने अपने शोधपरक व्याख्यान प्रस्तुत किए।
वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की भूमिका केवल सहायक नहीं बल्कि सृजनात्मक, दार्शनिक और वैज्ञानिक नेतृत्वकारी रही है। वैदिक काल की ब्रह्मवादिनी स्त्रियों से लेकर आधुनिक वैज्ञानिकों तक महिलाओं ने ज्ञान की धारा को समृद्ध किया है।
संगोष्ठी का संचालन डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी, प्रिया श्रीवास्तव और श्रद्धा गुप्ता ‘केसरी’ ने प्रभावी ढंग से किया। कार्यक्रम के अंत में निधि सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी विद्वानों, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर संगोष्ठी के संयोजक विनोद यादव ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं के योगदान पर गंभीर और व्यापक शोध की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के सामने इस समृद्ध विरासत को सही रूप में प्रस्तुत किया जा सके।
संगोष्ठी ने यह संदेश दिया कि भारतीय सभ्यता की ज्ञानधारा में महिलाओं की भूमिका प्राचीन काल से ही केंद्रीय रही है और आधुनिक विज्ञान एवं अंतरिक्ष अनुसंधान तक उसकी निरंतरता बनी हुई है।
