
रानीगंज। रानीगंज खनन क्षेत्र के आस-पास इलाको में आदिवासियों का पारंपरिक और सांस्कृतिक त्यौहार बांदना पर्व इस वर्ष आर्थिक संकट और रोज़गार की कमी के कारण अपनी पुरानी चमक खोता नज़र आ रहा है। आदिवासी बस्तियों में जहां कभी इस पर्व के दौरान नृत्य, गीत और सामूहिक उत्सव का माहौल रहता था, वहां अब उदासी और चिंता साफ दिखाई दे रही है। रानीगंज कोयला खनन क्षेत्र के कई आदिवासी युवक रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों में प्रवासी मजदूर बन चुके हैं। दूरदराज़ इलाकों में काम करने के कारण वे इस बार बांदना पर्व पर घर नहीं लौट सके।
स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में 100 दिन का काम (मनरेगा) बंद है, दिन-मजदूरी भी नहीं मिल रही। खेती करने वालों को बढ़ती लागत के कारण लाभ नहीं हो पा रहा। राशन व्यवस्था में भी कटौती हुई है,अंत्योदय योजना के तहत जहां पहले प्रति परिवार 21 किलो चावल मिलता था, अब वह घटकर 15 किलो रह गया है। गेहूं और आटे की मात्रा बढ़ी है, लेकिन आदिवासी समुदाय चावल ही चाहता है, जो उन्हें मिल नहीं पा रहा। वही
चेलोद आदिवासी पाड़ा के निवासी रेबु मुर्मू बताते हैं कि बांदना पर्व, जिसे आदिवासी भाषा में ‘सहराय’ कहा जाता है, राढ़ बंगाल और संथाल परगना की एक प्राचीन लोक परंपरा है। यह फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला उत्सव है, जिसमें टुसू पूजा, टुसू गीत, झुमुर गीत और आदिवासी नृत्य प्रमुख आकर्षण होते थे। लेकिन अब इन सबमें काफी कमी आ गई है।वही लक्ष्मीराम हांसदा के अनुसार, इस पर्व का सीधा संबंध खेती, मनरेगा और दिहाड़ी मजदूरी से है। जब रोज़गार ही नहीं है, तो उत्सव केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। सीपीआई(एम) शासित आमरासोता पंचायत के प्रधान संजय हेम्ब्रम ने बताया कि पंचायत की ओर से कुछ आदिवासी इलाकों को सजाने की व्यवस्था की गई है, लेकिन कई पंचायतों में यह काम भी नहीं हो सका। निगम क्षेत्र की आदिवासी बस्तियों में तो सरकारी सहायता पूरी तरह नदारद है। आदिवासियों का आरोप है कि राज्य सरकार अन्य त्योहारों में क्लबों को लाखों रुपये की सहायता देती है, लेकिन आदिवासी पर्वों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। बांसड़ा स्थित ईसीएल की ओपन कास्ट खदान में उत्पादन बंद होने से लगभग 30 आदिवासी युवक बेरोज़गार हो गए हैं। वहीं, 23 एकड़ आदिवासी भूमि के अधिग्रहण के बावजूद मुआवज़ा नहीं मिला है। लोगों का कहना है कि मौजूदा शासन में आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकार खतरे में हैं। इन तमाम आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद, कोयलांचल के आदिवासी अपने रीति-रिवाज़, भाषा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दुख और अभाव के बीच भी बांदना पर्व, उनके सामूहिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनकर मनाया जा रहा है।
