
रानीगंज। श्री सीताराम जी भवन में आयोजित सप्ताहव्यापी श्रीमद्भागवत कथा के दौरान ऋषिकेश से पधारे प्रख्यात कथावाचक स्वामी अमृत प्रकाश जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का भावपूर्ण और सारगर्भित वर्णन किया। उन्होंने कथा के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से भक्तों को भक्ति, नीति और शिष्टाचार का महत्व समझाया।
कथा के दौरान स्वामी अमृत प्रकाश जी महाराज ने विदुर नीति का अत्यंत सुंदर और प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत करते हुए बताया कि जब भगवान श्रीकृष्ण राजदरबार पहुंचे, तब दुर्योधन ने उन्हें घमंड और अहंकार के भाव से अपने यहां आमंत्रित किया, जबकि विदुर ने पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता के साथ भगवान को अपने घर आमंत्रित किया। भगवान श्रीकृष्ण ने अहंकार को त्यागकर भक्ति को स्वीकार किया और स्पष्ट कहा कि वे विदुर के घर ही जाएंगे, क्योंकि भगवान सच्चे भक्त के प्रेम के भूखे होते हैं, न कि वैभव और घमंड के।
उन्होंने बताया कि विदुर भगवान के चरणों में बैठकर सेवा भाव से नतमस्तक थे, जबकि दुर्योधन अपने अहंकार में भगवान के सामने आसन ग्रहण किए बैठा था। इसी से शिष्टाचार और विनम्रता का भेद स्पष्ट होता है। स्वामी जी ने कहा कि भगवान उसी पर कृपा करते हैं जो सत्यनिष्ठा और पूर्ण समर्पण के साथ उन्हें मानता है।
कथावाचक ने आगे कहा कि जो व्यक्ति भगवान के चरणों में शरणागत हो जाता है, भगवान स्वयं उसके हो जाते हैं। अनैतिकता, अधर्म और दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाश के लिए ही भगवान ने महाभारत जैसी लीला की रचना की, ताकि धर्म की स्थापना हो सके। कथा के दौरान सभागार में उपस्थित श्रद्धालु भक्ति भाव में लीन नजर आए।
