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"एकतरफा नहीं हो सकती है पंथनिरपेक्षता" - Kolkata Saransh News

“एकतरफा नहीं हो सकती है पंथनिरपेक्षता”

 


क्रांति कुमार पाठक

पिछले कुछ दिनों से विभिन्न त्यौहारों पर या हाल के दिनों में एक टीवी डिबेट में नूपुर शर्मा के बयान के बाद हुए हिंसक टकराव की जैसी घटनाएं देखने को मिलीं, वैसी इसके पहले कभी नहीं देखी गई। इस सिलसिले के थमने के आसार भी नहीं दिख रहे हैं। इसके लिए कुछ क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस इस स्थिति के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है, क्योंकि वही है जो 2014 में केंद्रीय सत्ता से बेदखल होने के बाद सांप्रदायिक माहौल खराब होने और संविधान एवं कानून के खिलाफ काम होने का आरोप लगाती रहती है। एक अजीब मनोदशा से पीड़ित गांधी परिवार यही साबित करने पर तुला हुआ है कि उसकी सत्ता छिनने के बाद देश का सामाजिक तानाबाना छिन्न भिन्न हो गया है। यह कोड़ी झूठ है। सच यही है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से ही पार्टी की नीतियों में हिंदू विरोध का भाव दिखने लगा था और अब पार्टी उसी पाप की कीमत चुका रही है।
1947 में भले ही देश का धार्मिक आधार पर विभाजन हो गया हो, लेकिन भारत में हिन्दू बहुसंख्यकों ने देश को पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाने पर पूरा जोर दिया। एक विविधतापूर्ण उदार समाज बनाने के प्रति हिन्दूओं की इस अवधारणा, प्रतिबद्धता को कांग्रेस ने न तो कभी मान्यता दी और न ही उसका सम्मान किया। इसके बजाय पार्टी ने हिंदू मान्यताओं का माखौल उड़ाया। वहीं अन्य धर्म-संस्थाओं की निंदा योग्य मान्यताओं पर भी आंखें बंद रखी। यह तभी दिख गया था, जब पंडित नेहरू हिन्दू कोड बिल को आगे बढ़ाने के इच्छुक और मुस्लिम एवं अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में ऐसे ही सुधारों को लागू कराने को अनिच्छुक दिखे। यही समस्या का आरंभिक विंदू था।
दरअसल, जब हिन्दूओं ने पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र का विकल्प चुना तो कांग्रेस को चाहिए था कि वह भारत में सभी समुदायों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करता, जो सभी समुदायों के लिए मार्गदर्शक बनता। जो लोग किसी भी सूरत में मुस्लिम पर्सनल लॉ कायम रखना चाहते थे, उनके लिए पाकिस्तान का विकल्प था, परंतु पंडित नेहरू ने इनमें से कोई दांव नहीं आजमाया। इसके बजाय उन्होंने और उनकी पार्टी ने पहले दिन से ही मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाई। कांग्रेस को मुस्लिम वोट बैंक स्थाई दिखने लगा और उसे अपना मूल सिद्धांत मान लिया। साथ ही साथ हिंदूओं को हल्के में लेना शुरू कर दिया और उसके स्वाभिमान पर आघात किया।
चूंकि पंडित नेहरू स्वतंत्रता संघर्ष के प्रमुख नेता और कद्दावर व्यक्तित्व के स्वामी थे तो हिन्दुत्व के प्रति उनके तिरस्कार भाव ने हिंदूओं को अपने धर्म एवं संस्कृति के प्रति हीन भावना से भर दिया। इसके बाद अन्य दल भी मुस्लिम वोट की इस बंदरबांट में शामिल हो गए और उन्होंने कांग्रेस के इस खजाने में भरपूर सेंध लगाते हुए अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत किया। हिंदू केवल उदासी के साथ बेबस होकर यह सब देखते रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक इकाई जनसंघ को छोड़कर कोई भी हिन्दू हितों के लिए आवाज उठाने वाला नहीं था। दशकों तक यह सिलसिला कायम रहा। इससे हिंदुओं के भीतर असंतोष का भाव बढ़ने लगा। फिर एक निर्णायक पड़ाव आया। यह पड़ाव था अयोध्या में राम मंदिर के समर्थन में शुरू की गई भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा, जिसमें उन्होंने आहवान किया था ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’। इस नारे का उद्देश्य हिन्दूओं को प्रेरित करना, जिनको कांग्रेस ने लगातार दुर्गति की थी। हिंदूओं को सदैव हेय दृष्टि से देखने वाले कांग्रेस और कम्युनिस्ट नेताओं के अलावा ऐसे ही अन्य वर्गों ने जब पहली बार यह नारा सुना तो उन्होंने उसका खूब उपहास ही उड़ाया। मानों उन्हें यह महसूस हुआ कि उन्होंने हिंदूओं का इतना मानमर्दन कर दिया है कि अब वे कभी एकजुट होकर लामबंद हो ही नहीं सकते। वे गलत साबित हुए।
बीतते समय के साथ भारत में सेक्यूलरिज्म ने छद्म सेक्यूलरिज्म का रूप धर लिया। जिसमें एक ओर जहां मुस्लिमों, ईसाईयों आदि के धार्मिक अधिकारों के लिए आवाज बुलंद होती रही वहीं दूसरी ओर हिंदूओं के धार्मिक अधिकारों को नकारा जाता रहा। इससे हिंदुओं में आक्रोश का सैलाब भरता गया और एक समय पर वह फूट पड़ा। परिणामस्वरूप आज हिन्दू भी अपने धर्म को लेकर मुस्लिम और ईसाई की भांति सजग एवं आग्रही है, लेकिन इसे अनुदार और पंथनिरपेक्षता विरोधी ठहराया जा रहा है। छद्म सेक्यूलर लोगों का एक वर्ग इसे साबित करने की मुहिम में लगा हुआ है, जबकि उनमें से कुछ के नाम ही ‘रामचंद्र’ और ‘सीताराम’ है। वे अपने उसी स्वर्णिम दौर की वापसी के लिए सक्रिय हैं, जब हिन्दू दमित और उपेक्षित थे। कुछ लोग तो स्वतंत्रता के समय से ही इस अभियान में जुट गए थे। हालांकि अब उनकी संख्या घटी है और जो बचे हैं, वे इसी कारण कि उनके पास इससे निकलने के बाद कोई और विकल्प नहीं। जबकि इस बीच हिंदूओं को महसूस हुआ कि अगर उनके धार्मिक अधिकार अन्य पंथों-मजहबों की भांति संरक्षित नहीं हुए, तो हिन्दुत्व समाप्त हो जाएगा। एक तरह से अपना अस्तित्व बचाने के लिए ही हिंदूओं में यह अलख जगी है। आज हिन्दू एक नई व्यवस्था की मांग कर रहा है। कुल मिलाकर ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ नारे ने अब साकार रूप ले लिया है, किंतु इसमें करीब 25 साल का समय लग गया। एकाएक हिंदूओं में जागृति आई। वह चुनावों से लेकर इंटरनेट पर अपनी मौजूदगी दिखा रहा है। ‘इंटरनेट पर सक्रिय हिंदू’ उस छद्म सेक्यूलर तबके की घेराबंदी कर ली है, जो नेहरुवादी छतरी के तले हिंदू विरोधी खुराक पर जीता आया है। ऐसी स्थिति में हम किस दिशा में जाते दिख रहे हैं? जिस न‌ई व्यवस्था की बात हो रही है, उसमें आखिर क्या होना चाहिए? इसमें हिंदूओं और मुस्लिमों एवं अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच एक नया समीकरण बने, जिसमें अल्पसंख्यक पंथ-मजहबों की कुछ पहलुओं का ध्यान रखना होगा। उन्हें स्मरण रहे कि भारत पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र इसी कारण है, क्योंकि बहुसंख्यक हिन्दूओं ने यही चाहा। दूसरी बात यह है कि पंथनिरपेक्षता एकतरफा नहीं हो सकती और सभी मतावलंबियों को पंथनिरपेक्ष आदर्शों का पालन करना होगा। किसी भी धर्म के विरुद्ध विषवमन पर प्रतिबंध और उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। हिंदूओं को भी उतने ही धार्मिक अधिकार मिलने चाहिए, जितने अन्य मतावलंबियों के पास हैं।

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