कोलकाता के स्कूलों में इस्कॉन को मिड-डे मील देने के प्रस्ताव पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से मांगा हलफनामा

कोलकाता, 08 जुलाई । कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह कोलकाता के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पीएम-पोषण योजना के तहत मिड-डे मील की व्यवस्था इस्कॉन को सौंपने के प्रस्ताव पर अपना आधिकारिक रुख हलफनामे के जरिए अदालत के समक्ष पेश करे। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।

यह निर्देश कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई के दौरान दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत को बताया कि यदि मिड-डे मील पकाने और परोसने का कार्य इस्कॉन को सौंपा जाता है तो स्कूलों में विद्यार्थियों को मिलने वाले अंडे बंद हो सकते हैं। साथ ही, वर्तमान में यह कार्य कर रही हजारों स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की महिला सदस्यों की आजीविका भी प्रभावित होगी।

याचिका में कहा गया कि पीएम-पोषण योजना का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराना भी है। ऐसे में यदि भोजन तैयार करने और वितरण का कार्य किसी अन्य संस्था को दिया जाता है तो योजना का यह उद्देश्य भी प्रभावित होगा।

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि मुख्यमंत्री ने विधानसभा में घोषणा की थी कि कोलकाता के एक हजार 800 सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पीएम-पोषण योजना के तहत मिड-डे मील इस्कॉन उपलब्ध कराएगा। हालांकि अदालत के सवाल पर उन्होंने स्वीकार किया कि इस संबंध में राज्य सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है।

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता सुरजीत नाथ मित्रा ने अदालत को बताया कि इस संबंध में अभी तक कोई अंतिम निर्णय या सरकारी आदेश जारी नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि जनहित याचिका केवल आशंकाओं के आधार पर दायर की गई है।

महाधिवक्ता ने यह भी बताया कि वर्ष 2010 की केंद्रीय अधिसूचना और पीएम-पोषण योजना के प्रावधानों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में जहां स्कूलों में भोजन पकाने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती, वहां सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत केंद्रीकृत रसोई की व्यवस्था की जा सकती है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भी टिप्पणी की कि वर्ष 2010 की केंद्रीय अधिसूचना में गैर-सरकारी संगठनों और अन्य उपयुक्त संस्थाओं की भागीदारी पर रोक नहीं है। हालांकि अदालत ने यह जानना जरूरी माना कि मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद राज्य सरकार ने इस दिशा में कोई औपचारिक कार्रवाई की है या नहीं।

खंडपीठ ने राज्य सरकार को इस पूरे मामले पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *