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"भाजपा क्या दक्षिण में झंडा गाड़ पाएगी" - Kolkata Saransh News

“भाजपा क्या दक्षिण में झंडा गाड़ पाएगी”

क्रांति कुमार पाठक

केंद्र में पिछले आठ सालों से भाजपा की सरकार होने और उत्तर भारत में इसकी अभूतपूर्व मजबूती के बावजूद कुछ समय तक दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों में हिंदूत्व की राजनीति का कोई खास प्रभाव नहीं था लेकिन दक्षिण भारत में भी अब आश्चर्यजनक रूप से भाजपा का असर दिखाई पड़ने लगा है। ज्ञात हो कि दक्षिण के केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक राज्यों में 129 लोकसभा सीटें हैं, जहां अब तक भाजपा ने कोई खास उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाई है। यही वजह है कि भाजपा की निगाहें अब दक्षिण भारत पर है और वह दक्षिण भारत के उन सभी 129 लोकसभा सीटों में बड़े पैमाने पर सेंध लगाना चाहती है। क्योंकि उसका मानना है कि 2024 में पश्चिम बंगाल या हिंदी पट्टी में अगर कुछ सीटें कम आईं तो यहां से उसकी भरपाई की जा सकती है। यही वजह है कि दक्षिण मिशन की कमान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संभालने जा रहे हैं। इसकी शुरुआत जुलाई के पहले हफ्ते से होगी, जब हैदराबाद में पार्टी की दो दिवसीय कार्यकारणी की बैठक होगी। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भाग लेंगे और साथ ही एक बड़ा रोड शो भी करेंगे। इसके अलावे भी पार्टी अगले कुछ महीनों में मिशन दक्षिण के तहत वहां क‌ई कार्यक्रम भी आयोजित करने जा रही है।
इस तरह से भाजपा के मिशन 2024 के लिए दक्षिण भारत काफी अहम है। क्योंकि भाजपा को अगर 2024 में भी केंद्र की सत्ता में वापसी करनी है तो उसे दक्षिण भारत के पांच राज्यों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना की कुल 129 लोकसभा सीटों पर भी फोकस करना होगा, जो भाजपा कर भी रही है। केरल में लोकसभा की 20 सीटें हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने केरल से 15 सीटें जीती थीं। इसके अलावे मुस्लिम लीग 2, सीपीएम 1, केसीएम 1 और आर‌एसपी को 1 सीटें मिली थीं। जब कांग्रेस सब जगह कमजोर थी, केरल में उसे अच्छी सफलता मिली। भाजपा का मानना है कि 2024 में यह स्थिति नहीं होगी, क्योंकि भाजपा को अब यहां के लोग भी विकल्प के रूप में देखना शुरू कर दिया है। उसे उम्मीद है कि कांग्रेस जिस तरह से हर जगह से कमजोर हो गई है, उसी तरह से केरल में भी वह अपना आधार खो देगी। कुछ समय बाद भाजपा ही वामपंथियों के सामने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बनेगी। केरल अकेला दक्षिणी राज्य है जहां भाजपा की रणनीति अभी तक सफल नहीं हुई है। हिंदू राज्य की कुल आबादी का करीब 55 फीसदी हैं और वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी लंबे समय से सक्रिय हैं। इसके बावजूद राज्य में भाजपा का असर न के बराबर है। हालांकि भाजपा का मानना है कि पिछले साल जी-20 समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पोप से मिले थे, तब क्रिश्चियन समुदाय में इसका सकारात्मक संदेश गया था। केरल में 20 फीसदी आबादी क्रिश्चियन है। हाल ही में केरल में एक क्रिश्चियन लड़की की मुस्लिम से शादी का मामला तूल पकड़ा था। इस पर भाजपा ने कहा था कि लव जिहाद का मसला सिर्फ हिन्दू के लिए ही नहीं है, क्रिश्चियन के लिए भी बड़ा इश्यू है। भाजपा यहां क्रिश्चियन समुदाय में अपनी पैठ जमाने की कोशिश कर रहा है।
कर्नाटक दक्षिण भारत का अकेला राज्य है, जहां भाजपा पिछले कई सालों से मजबूत है। उल्लेखनीय है कि केएस सुदर्शन, एच वी शेषाद्रि और दत्तात्रेय होसबले जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेता की जड़ें कर्नाटक में हैं। इस राज्य में भाजपा के ताकतवर होने का एक कारण यह भी है कि यहां कोई क्षेत्रीय दल मजबूती से उभर नहीं पाई। यह आकस्मिक नहीं है कि कर्नाटक में भाजपा का उभार बीती सदी के आखिरी दशक में तब हुआ, जब वहां कांग्रेस खत्म हो रही थी। हाल के दिनों में वहां हिजाब के अलावा उठे दूसरे मुद्दों से हिन्दुत्व की राजनीति के उत्तरोत्तर मजबूत होने का ही पता चलता है। राज्य में हिंदुत्व के बढ़ते दबदबे के कारण ही पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 50 फीसदी से भी अधिक था। कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं जिनमें से पिछले चुनाव में भाजपा ने 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी। भाजपा के लिए यहां अपने प्रदर्शन को बरकरार रखने की चुनौती है। यहां अगले साल विधानसभा चुनाव भी होने हैं।
तमिलनाडु में भाजपा की वैसी उपस्थिति भले न हो, पर मौजूदा समय में पार्टी के चार विधायक हैं। भाजपा जानती है कि इस दक्षिणी राज्य में राम के नाम पर राजनीति करना कठिन है, इसलिए उसने राम की जगह मुरुगा को महत्व दिया है। ‘कंडा षष्टि कवचम’ विवाद से भी राज्य में भाजपा ने अपनी प्रासंगिकता बनाई है। हाल में ‘पटिटना प्रवेशम’ जिसमें शैव मत के महंत को पालकी में बिठाकर कंधों पर ले जाने की परंपरा है, पर हुआ विवाद भी राज्य में हिंदुत्व के बढ़ते असर का प्रमाण है। द्रमुक सरकार ने पहले धर्मपुर मठ में इस पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन बढ़ते दबाव के कारण उसे वह प्रतिबंध हटाना पड़ा। कभी द्रमुक मंदिरों में जाने और भगवान के सामने पूजा करने की सख्त आलोचना करते थे, लेकिन अब इसी पार्टी के नेताओं को अपनी धार्मिक निष्ठा के बारे में बताते हुए हिचक नहीं होती। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि तमिलनाडु के लोग हिंदू धर्म और राजनीतिक हिंदूत्व के बीच का फर्क समझते हैं। इसके बावजूद राज्य में हिंदुत्व के बढ़ते असर से इन्कार नहीं किया जा सकता है। इसका एक बड़ा प्रमाण यह भी है कि मुख्यमंत्री के रूप में स्टालिन के एक साल के कार्यकाल की तीखी आलोचना भाजपा ने ही की है। भाजपा के मिशन 2024 के लिए तमिलनाडु इसलिए अहम है क्योंकि यहां भाजपा जीरो ही है। पिछले लोकसभा चुनाव में एआईएडीएमके के साथ गठबंधन कर वह चार सीटें जीतने में सफल रहा था। फिर भाजपा के लिए तमिलनाडु इसलिए भी चैलेंजिंग है कि यहां भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी के तौर पर देखा जाता है, साथ ही उसकी इमेज हिंदुत्ववादी पार्टी की है, जिसमें ज्यादातर ब्राह्मण हैं। साथ ही भाजपा पर यह भी आरोप लगता रहता है कि वह सब पर हिंदी थोपने की कोशिश कर रही है। भाजपा को तमिलनाडु में अगर अपनी जगह बनानी है तो उसे यहां के लोगों से इमोशनली कनेक्ट होना होगा और हिंदुत्ववादी पार्टी के साथ ही हिंदी थोपने की कोशिश वाली इमेज से बाहर निकलना होगा। हालांकि तमिलनाडु के निकाय चुनाव में भाजपा ने 230 नगर पंचायत वार्ड, 56 नगरपालिका वार्ड और 23 नगर निगम वार्ड, जिसमें एक चेन्नई का भी शामिल है जीतने में सफल रही है, जो कि भाजपा की तमिलनाडु में बढ़ते जनाधार को ही दर्शाता है।
आंध्र प्रदेश में भाजपा की वैसी उपस्थिति नहीं है, लेकिन चंद्रबाबू नायडू की तेलगु देशम पार्टी जिस तरह से खुद को भाजपा की समर्थक के रूप में पेश कर रही है, उससे साफ है कि वहां हिंदुत्व की जमीन तैयार करने की कोशिश हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा की रणनीति के जरिए नायडू अपनी पार्टी का जनाधार मजबूत करने में लगे हैं। चूंकि राज्य के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ईसाई हैं, इस कारण नायडू उन पर धर्मांतरण को बढ़ावा देने का आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने जगन मोहन रेड्डी पर यह भी आरोप लगाया है कि उनमें हिंदू परंपराओं के प्रति कोई सम्मान नहीं है। इसकी प्रतिक्रिया में मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने नौ मंदिरों के पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी। वर्ष 2024 में आंध्र प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और भाजपा का मानना है कि वहां त्रिकोणीय राजनीतिक लड़ाई होगी।
जहां तक तेलंगाना की बात है, तो वहां हिन्दुत्व के असर का प्रमाण यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा वहां कुल 17 में से 4 लोकसभा सीटें जीतकर सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति के बाद दूसरे स्थान पर थी। वर्ष 2020 के अंत में हैदराबाद में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में भाजपा ने बहुत रूचि दिखाई और वहां हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का कार्ड बेहद प्रभावी तरीके से खेला गया। जिसका नतीजा हुआ कि भाजपा को 48 वार्डों में विजय मिली। उस चुनाव में भाजपा की शानदार जीत ने राज्य के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी राजनीतिक गठबंधन बनाने की योजना ध्वस्त कर दी थी। उसके बाद राव ने अपना पूरा ध्यान तेलंगाना की राजनीति पर केंद्रित करने को मजबूर हो गए।

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