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सभ्यताएं संवाद करती हैं, संघर्ष नहीं - प्रो.संजय द्विवेदी - Kolkata Saransh News

सभ्यताएं संवाद करती हैं, संघर्ष नहीं – प्रो.संजय द्विवेदी

‘सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा देने में प्रवासी भारतीयों की भूमिका’ विषय पर संवाद

भोपाल । भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी का कहना है कि संवाद से दुनिया की हर समस्या का समाधान हो सकता है। जो लड़ रहे हैं, उन्हें लड़ाई के बजाए संवाद पर आना चाहिए, क्योंकि सभ्यताएं संवाद करती हैं, संघर्ष नहीं। वे राम जानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस,(आरजेएस पीबीएच) के आनलाईन संवाद कार्यक्रम को अध्यक्ष की आसंदी से संबोधित कर रहे थे। ‘सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा देने में प्रवासी भारतीयों की भूमिका’ विषय पर आयोजित संवाद कार्यक्रम में लंदन के प्रवासी भारतीय लेखक नितिन मेहता, द टेंपल ऑफ अंडरस्टैंडिंग इंडिया फाउंडेशन के महासचिव डा. ए के मर्चेंट, राम जानकी संस्थान के संस्थापक उदय कुमार मन्ना ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
प्रो.द्विवेदी ने कहा कि मीडिया का भारतीयकरण आवश्यक है, जिससे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ (सभी सुखी हों) जैसे भारतीय मूल्यों की स्थापना संभव हो सके। उन्होंने कहा कि प्रवासी भारतीयों ने अपने सकारात्मक योगदान से वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को स्थापित किया है। उन्होंने कहा कि भारतवंशियों द्वारा की गयी पत्रकारिता ने भी वैश्विक स्तर पर सकारात्मक संचार किया है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता द टेम्पल ऑफ अंडरस्टैंडिंग इंडिया फाउंडेशन के महासचिव डॉ. ए.के. मर्चेंट ने प्रवासी सांस्कृतिक कूटनीति पर चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय प्रवासियों का सूर्य कभी अस्त नहीं होता, क्योंकि वे लगभग 136 देशों में निवास करते हैं। उन्होंने गिरमिटिया श्रम, स्वतंत्रता के बाद प्रवासन और खाड़ी देशों में प्रवासन में प्रवासी भारतीयों के इतिहास को वर्गीकृत किया तथा भारत की विदेश नीति पर इसके बढ़ते प्रभाव का उल्लेख किया। श्री मर्चेंट ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के मंत्र को भारतीय विदेश नीति की आधारशिला बताया जो सम्मान, सुविधा, समृद्धि, सुरक्षा और सभ्यता के माध्यम से विश्व शांति और सद्भाव को बढ़ावा देता है। उन्होंने प्रौद्योगिकी में भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए इसकी आकांक्षा पर प्रकाश डाला, जिससे प्रवासी और भारतीय विदेश नीति के बीच सहजीवी संबंध स्थापित हुए हैं।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रवासी लेखक नितिन मेहता (लंदन) ने सांस्कृतिक राजदूतों के रूप में भारतीय प्रवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका और एक आशावादी भारत को आकार देने में सकारात्मक मीडिया की परिवर्तनशील शक्ति पर प्रकाश डाला, जो विश्व मंच पर नेतृत्व करने के लिए तैयार है। श्री मेहता ने विश्व योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता दिलाने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की । उन्होंने केन्या से यूके तक की अपनी व्यक्तिगत यात्रा साझा की, जिसमें भारतीय संस्कृति की वैश्विक प्रतिध्वनि को दर्शाया गया। उन्होंने योग, ध्यान , उपवास और शाकाहार को व्यापक रूप से अपनाने पर भी जोर दिया।
आरजेएस पीबीएच क्रिएटिव टीम की प्रमुख आकांक्षा मन्ना ने लाला हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा, मैडम भीकाजी कामा और राजा महेंद्र प्रताप जैसी ऐतिहासिक प्रवासी हस्तियों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने विदेशी भूमि से भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और सांस्कृतिक राजदूतों के रूप में प्रवासियों की दीर्घकालिक भूमिका का उदाहरण प्रस्तुत किया।
केन्या के श्री रमेश मेहता ने सकारात्मक सोच और प्रवासी योगदान के महत्व की पुष्टि की। केन्या में नेत्र देखभाल के लिए लायंस क्लब का हवाला देते हुए उसके सामुदायिक प्रभाव का प्रमाण दिया। एक व्यक्तिगत स्पर्श जोड़ते हुए, नागपुर की श्रीमती रति चौबे ने न्यूजीलैंड में अपने हालिया अनुभव को साझा किया, जहाँ उन्होंने मकर संक्रांति समारोह देखा। साधक ओमप्रकाश ने आध्यात्मिकता और सकारात्मक सोच की भूमिका पर जोर दिया साथ ही सत्य की सर्वोच्चता पर एक संस्कृत श्लोक का पाठ किया। कार्यक्रम का समापन वैश्विक समुदाय से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को अपनाने और एकता, शांति और साझा समृद्धि के भविष्य की दिशा में काम करने के सामूहिक आह्वान के साथ हुआ।

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