
कुनुस्तोड़िया एरिया कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन, ईसीएल अधिकारियों को सौंपा मांगपत्र
जामुड़िया। जामुड़िया की जीवनरेखा कही जाने वाली सिंघारन नदी के प्राकृतिक प्रवाह और गतिपथ से कथित छेड़छाड़ के विरोध में सोमवार को सिंघारन नदी बचाव समिति की ओर से ईसीएल के कुनुस्तोड़िया एरिया कार्यालय के समक्ष विरोध सभा आयोजित की गई। इस दौरान समिति के सदस्यों और स्थानीय लोगों ने नदी के प्राकृतिक स्वरूप और अस्तित्व की रक्षा की मांग को लेकर आवाज बुलंद की। सभा के बाद समिति का एक प्रतिनिधिमंडल ईसीएल अधिकारियों से मिला और सिंघारन नदी के संरक्षण से संबंधित विभिन्न सुझाव एवं मांगों का ज्ञापन सौंपा। सभा को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय नदी बचाव समिति के तापस दास ने कहा कि प्रकृति के साथ जब गलत व्यवहार किया जाता है, तो उसका दुष्परिणाम मनुष्य को ही भुगतना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में नेपाल में हुई प्राकृतिक त्रासदी इस बात का उदाहरण है कि प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ और उसके संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और उनके आसपास के पर्यावरण के साथ इसी तरह खिलवाड़ जारी रहा, तो आने वाले दिनों में गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। तापस दास ने कहा कि जामुड़िया की एकमात्र प्रमुख नदी सिंघारन का लगातार दोहन किया जा रहा है। एक ओर विभिन्न औद्योगिक गतिविधियों के कारण नदी के प्रदूषित होने की शिकायतें सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर नदी के प्राकृतिक गतिपथ के साथ भी कथित रूप से छेड़छाड़ की जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि सिंघारन नदी के साथ इसी तरह का व्यवहार जारी रहा, तो आने वाले समय में नदी के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो सकता है। उन्होंने कहा कि नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का आधार हैं। मनुष्य के साथ-साथ अनेक जीव-जंतु और वनस्पतियां भी नदियों पर निर्भर हैं। इसलिए नदियों का संरक्षण केवल किसी एक संस्था या संगठन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है। उन्होंने लोगों से नदी और पर्यावरण संरक्षण के अभियान में सक्रिय रूप से जुड़ने का आह्वान किया।
उन्होंने बताया कि आगामी 27 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय नदी बचाव दिवस के अवसर पर दुनिया के करीब 100 देशों में नदी संरक्षण को लेकर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि नदियों को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर भी लगातार जनजागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। वहीं, सिंघारन नदी बचाव समिति के संयोजक अजीत कोड़ा ने आरोप लगाया कि ईसीएल कुनुस्तोड़िया एरिया प्रबंधन की ओर से सिंघारन नदी के प्राकृतिक गतिपथ के साथ छेड़छाड़ की जा रही है, जो पर्यावरण की दृष्टि से गंभीर विषय है। उन्होंने कहा कि एमडीओ परियोजना के नाम पर परसिया क्षेत्र में कई स्थानों पर सिंघारन नदी के प्राकृतिक प्रवाह एवं गतिपथ में बदलाव किया गया है। इसके अलावा बड़ी संख्या में पेड़-पौधों की कटाई किए जाने से क्षेत्र के प्राकृतिक पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचने का आरोप उन्होंने लगाया। अजीत कोड़ा ने कहा कि विकास परियोजनाओं के नाम पर पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह से नदी के प्राकृतिक स्वरूप में बदलाव किया जा रहा है, उससे भविष्य में सिंघारन नदी के अस्तित्व पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा कि नदी के अस्तित्व की रक्षा के लिए सिंघारन नदी बचाव समिति हर स्तर पर संघर्ष करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि समिति का उद्देश्य किसी विकास कार्य का विरोध करना नहीं, बल्कि विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना है। उन्होंने ईसीएल प्रबंधन से मांग की कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखा जाए, उसके गतिपथ में किसी भी प्रकार का अनावश्यक बदलाव नहीं किया जाए तथा नदी के आसपास काटे गए पेड़-पौधों के स्थान पर व्यापक स्तर पर पौधरोपण किया जाए।
सभा के बाद सिंघारन नदी बचाव समिति का प्रतिनिधिमंडल ईसीएल कुनुस्तोड़िया एरिया महाप्रबंधक की अनुपस्थिति में मानव संसाधन विभाग के महाप्रबंधक संदेश वडादे से मिला। प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपते हुए सिंघारन नदी के प्राकृतिक स्वरूप और पर्यावरण की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की। विरोध सभा में पूर्व विधायक धीरजलाल हाजरा, गौरांग चटर्जी, पश्चिम बंगाल विज्ञान मंच के धनुषधारी राय, किंग्सुख मुखर्जी, अरुण कुमार मुखर्जी, समाजसेवी मनोज दत्त, कलीमुद्दीन अंसारी, मंजय चटर्जी समेत समिति के कई सदस्य और स्थानीय लोग मौजूद थे।
