
कोलकाता । श्री वर्धमान जैन संघ चातुर्मास प्रबंध समिति, कोलकाता में मुनि रविन्द्र विजय महाराज, मुनि महेन्द्र विजय महाराज के सानिध्य में चातुर्मास में तप साधना, धर्म आराधना, धार्मिक कार्यक्रमों में श्रावक – श्राविका भाव विभोर हो रहे हैं ।

मुनि रविन्द्र विजय महाराज ने अपने प्रवचन में कहा तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने जीवन में मोक्ष के चार मार्ग बताए हैं, जिसमें से एक तप है । तपस्वियों का सम्मान तप का सम्मान है । तपस्वियों के सम्मान से स्वयं के हृदय में तप के प्रति बहुमान जागृत होता है । तपस्विनी कुसुम – विजय चन्द बैद, मनिता – कमल सुराणा एवं अनेक श्रावक – श्राविकाओं के तप की समाज ने सराहना की है ।

मुनि रविन्द्र विजय महाराज ने कहा तप – उपवास से व्यक्ति का मन एकाग्र एवं स्थिर रहता है । सामयिक से समता की साधना की जाती है । समता की भावना जागृत होने पर आत्मा का विकास होता है । जैन धर्म में तपस्या से पूर्व संचित कर्मों की निर्जरा होती है और इससे तपस्वी की आत्मा भी निर्मल होती है । जो व्यक्ति रस इंद्रियों को वश में रख सकता है वही व्यक्ति तप कर सकता है ।

विजय चन्द बैद, मुल्तान चन्द सुराणा, दिलीप दुगड़, रतनचंद बांगाणी, विनीत रामपुरिया, माणकचन्द सेठिया, मोहनलाल कोचर, आशीष कोचर, पारस सावनसुखा, शिखर चन्द बांठिया, सौरव सुराणा, अशोक बांठिया, आनन्द बांगानी एवं कार्यकारिणी सदस्यों ने स्वाधीनता दिवस के अवसर पर कार्यक्रम में शामिल होने का निवेदन किया ।
