आजादी के बाद पश्चिम बंगाल में सत्ता में पहली बार आयी भाजपा सरकार द्वारा आज (22 जून 2026) राज्य विधानसभा में पेश किये गये प्रथम बजट में अवकाश प्राप्त पत्रकारों को मिलने वाली पेंशन की राशि को 2500 से बढ़ा कर 5000 रुपये करने की घोषणा की है। यह निश्चय ही स्वागत योग्य कदम है। ज्ञातव्य है कि ममता सरकार ने अप्रैल 2018 से 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र वाले रिटायर हुए अनुभवी पत्रकारों के लिए 2500 रुपये की पेंशन की शुरुआत की थी। हालांकि उस समय अन्यान्य राज्यों में मिलने वाली राशि में यह न्यूनतम थी, जिसमें पिछली सरकार ने कोई बढ़ोतरी नहीं की। मालूम रहे कि पीएफ से पेंशन पाने वाले पत्रकार भी यह राशि पाने के हकदार हैं।
बजट घोषणा के बाद मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी (जिनके पास सूचना व संस्कृति विभाग भी है, जिसके तहत यह पेंशन दी जाती है) ने एक पत्रकार सम्मेलन में बताया कि पिछली सरकार में ऐसे लोगों को भी यह पेंशन दी जाती रही है, जो उनकी पसन्द के थे। पर हमारी सरकार में यह भेदभाव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि मैंने पेंशन पाने वालों की तालिका देखी है, जिसमें 156 नाम हैं। बहुत शीघ्र इस बारे में यथोचित कदम उठाये जायेंगे।
मेरे 51 वर्ष से भी अधिक समय के पत्रकारिता जीवन में कदम-कदम पर यह अनुभव किया है कि सारी दुनिया में कहीं भी कोई अन्याय हो रहा हो, या फिर किसी भी वर्ग की उचित मांगों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा हो, पत्रकार उनकी आवाज को जोर- शोर से उठाते हैं, पर उनके साथ कोई अन्याय हो रहा हो या फिर उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया जाता हो, तो उनकी आवाज में दम नहीं होता। चाहे वह सरकार के खिलाफ हो या फिर अपने गैर सरकारी प्रतिष्ठान के। पेंशन के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कांग्रेस सरकार ने तो अपने करीब 30 वर्षों के शासनकाल में इस बारे में कभी सोचा ही नहीं। वाममोंर्चा सरकार ने 34 वर्षो के शासन के अंतिम समय में कुछ कदम उठाये, पर उसे मूर्त रूप देने के पहले ही 2011 में उसका पतन हो गया। चाहे जो हो, अब जो सरकार आयी है और फिलहाल जिस गति व तरीके से काम कर रही है, उससे आम जनता में काफी आशा जगी है, जिसमें पत्रकार भी शामिल है। हालांकि पेंशन राशि अन्य भाजपा शासित राज्यों से काफी कम है, पर मात्र कुछ ही समय के अन्दर इसे दोगुना करने का जो कदम वर्तमान भाजपा सरकार ने उठाया है, वह स्वागत योग्य है। यही नहीं पेंशन के अलावा पत्रकारों की अन्यान्य समस्याओं व उचित मांगों पर यह सरकार सदैव ध्यान देगी, यह विश्वास है। मेरे (उम्र 73+) जैसे स्वतंत्र पत्रकारों को सरकारी परिचय पत्र रिन्युल कराने के लिए अपने नाम से प्रकाशित 24 कतरनें जमा करने में कितनी दिक्कत होती है, वह भुक्तभोगी ही जानता है। एक बात और । सूचना व संस्कृति विभाग में एक उपमंत्री पूर्णिमा चक्रवर्ती को बनाया गया है, जिन्होंने श्यामपुकुर से ममता सरकार में मंत्री रही शशि पांजा को हराया है। पहली बार विधायक व मंत्री बनी श्रीमती चक्रवर्ती न सिर्फ ऊर्जावान व मेहनती है, बल्कि जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए इस मुकाम तक पहुंची हैं। विश्वास है कि वे पत्रकारों की समस्याओं पर यथोचित ध्यान देंगी।
